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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 12 Geographical Perspective on Selected Issues and Problems (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India: People and Economy Chapter 12 Geographical Perspective on Selected Issues and Problems (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India: People and Economy Chapter 12 Geographical Perspective on Selected Issues and Problems (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
(i) निम्नलिखित में से सर्वाधिक प्रदूषित नदी कौन-सी है?
(क) ब्रह्मपुत्र
(ख) सतलुज
(ग) यमुना
(घ) गोदावरी
(ii) निम्नलिखित में से कौन-सा रोग जलजन्य है?
(क) नेत्रश्लेष्मला शोथ
(ख) अतिसार
(ग) श्वसन संक्रमण
(घ) श्वासनली शोथ
(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा अम्ल वर्षा का एक कारण है?
(क) जल प्रदूषण
(ख) भूमि प्रदूषण
(ग) शोर प्रदूषण
(घ) वायु प्रदूषण
(iv) प्रतिकर्ष और अपकर्ष कारक उत्तरदायी हैं
(क) प्रवास के लिए
(ख) भू-निम्नीकरण के लिए
(ग) गंदी बस्तियाँ
(घ) वायु प्रदूषण

उत्तर:
(i) (ग) यमुना
(ii) (ख) अतिसार
(iii) (घ) वायु प्रदूषण ।
(iv) (क) प्रवास के लिए

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
(i) प्रदूषण और प्रदूषकों में क्या भेद है?
उत्तर: प्रदूषण-मानवीय क्रियाकलापों से उत्पन्न अपशिष्टों उत्पादों से प्राकृतिक घटकों, जैसे-जल, वायु व भूमि के मूलभूत गुणों का ह्रास प्रदूषण कहलाता हैं।
प्रदूषक – उन पदार्थों, उत्पादों को प्रदूषक कहते हैं जो प्राकृतिक घटकों, जैसे-जल, वायु व भूमि में घुल-मिलकर उनकी गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
(ii) वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं-जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस का दहन, औद्योगिक प्रक्रमण से उत्पन्न विषाक्त धुंए वाली गैसों का उत्सर्जन, खनन कार्य आदि। ये सभी वायु में सल्फर, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, सीसा व एस्बेस्टास को वायुमंडल में निर्मुक्त करते हैं।
(iii) भारत में नगरीय अपशिष्ट से जुड़ी प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: भारत के नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या का अति संकुलन होने से प्रयुक्त उत्पादों के ठोस अपशिष्टों (कचरे) से गंदगी के ढेर जहाँ-तहाँ देखने को मिलते हैं। इनके निपटान की एक गंभीर समस्या है जिससे नगरीय वातावरण प्रदूषित होता है। प्लास्टिक, पोलिथिन, कंप्यूटर व अन्य इलैक्ट्रोनिक सामान के कबाड़ ने, कांच व कागज तथा मकानों की टूट-फूट/निर्माण से उत्पन्न मलबे ने इस अपशिष्ट के निपटान की समस्या को और गंभीर बना दिया है।
(iv) मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर: जीवाश्म ईंधन के दहन से औद्योगिक अपशिष्टों में व खनन प्रक्रियाओं से वायुमंडल में अनेक विषाक्त धुएँ वाली गैसों व लंबित धूल कणों, सीसा आदि का उत्सर्जन होता है जो वायु को प्रदूषित करते हैं। इनका मानव के स्वास्थ पर प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जाता है; जैसे-श्वसन तंत्रीय, तंत्रिका तंत्र, रक्तसंचार तंत्र संबंधी अनेक बीमारियाँ हो जाती है।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) भारत में जल प्रदूषण की प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: बढ़ती हुई जनसंख्या और औद्योगिक विस्तार के कारण जल के अविवेकपूर्ण उपयोग से जल की गुणवत्ता का व्यापक रूप से निम्नीकरण हुआ है। भारत की नदियों, नहरों, झीलों व तालाबों आदि का जल अनेक कारणों से उपयोग हेतु शुद्ध नहीं रह गया है। इसमें अल्पमात्रा में निलंबित कण, कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ समाहित होते हैं। जल में जब इन पदार्थों की मात्रा तय सीमा से अधिक हो जाती है तो जल प्रदूषित हो जाता है और जल में स्वतः शुद्धीकरण की क्षमता इसे शुद्ध नहीं कर पाती। ऐसा जल मानव व जीवों के उपयोग के योग्य नहीं रह जाता।
प्रदूषण के स्रोत – उत्पादन प्रक्रिया में लगे उद्योग अनेक अवांछित उत्पाद पैदा करते हैं। इनमें औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, जहरीली गैसे, रासायनिक अवशेष, अनेक भारी धातुएँ, धूल कण व धुआँ शामिल होता है। अधिकतर औद्योगिक कचरे को बहते हुए जल में व झीलों आदि में विसर्जित कर दिया जाता है। इस तरह विषाक्त रासायनिक तत्व जलाशयों, नदियों व अन्य जल भंडारों तक पहुँच जाते हैं जो इन जलस्रोतों में पनपने वाली जैव प्रणाली को नष्ट कर देते हैं।
सर्वाधिक जलप्रदूषक उद्योगों में, चमड़ा, लुगदी व कागज, वस्त्र तथा रसायन उद्योग हैं। आधुनिक कृषि में विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है जिनमें अकार्बनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक आदि भी प्रदूषण उत्पन्न करने वाले घटक हैं। ये रसायन वर्षा जल के साथ अथवी सिंचाई जल के साथ बहकर नदियों, झीलों व तालाबों में चले जाते हैं तथा धीरे-धीरे जमीन में स्रवित होकर भू-जल तक पहुँच जाते हैं। भारत में तीर्थयात्राओं, धार्मिक क्रियाकलापों, पर्यटन व सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जल प्रदूषित होता है। भारत में धरातलीय जल के लगभग सभी स्रोत संदूषित हो चुके हैं जो मानव उपयोग के योग्य नहीं रह गए हैं।
(ii) भारत में गंदी बस्तियों की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भारतीय नगरों में एक ओर सुविकसित नगरीय संरचना है तो दूसरे सिरे पर झुग्गी-बस्तियाँ, गंदी बस्तियाँ, झोंपड़पट्टी तथा पटरियों के किनारे बने ढाँचे खड़े हैं। इनमें वे लोग रहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में आजीविका के लिए प्रवासित होने के लिए मजबूर हुए हैं और जमीन की ऊँची कीमत के कारण अथवा ऊँचे किराए के कारण अच्छे आवासों में चाहते हुए भी नहीं रह पाते हैं तथा पर्यावरणीय दृष्टि से निम्नीकृत भूमि पर कब्जा कर रहने लगते हैं। गंदी बस्तियाँ न्यूनतम वांछित आवासीय क्षेत्र होते हैं जहाँ जीर्ण-शीर्ण मकान, स्वास्थ्य की निम्न सुविधाएँ, खुली हवा का अभाव, पेयजल, प्रकाश तथा शौच जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव पाया जाता है। ये क्षेत्र अधिक भीड़भाड़ वाले, पतली-सँकरी गलियों तथा आग लगने की उच्च संभावना वाले जोखिमों से परिपूर्ण होते हैं।
गंदी बस्तियों की अधिकांश जनसंख्या नगरीय अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र में कम वेतन पर अधिक जोखिमपूर्ण कार्य करती है। अतः ये लोग अल्पपोषित होते हैं। इन्हें विभिन्न रोगों और बीमारियों की संभावना बनी रहती है।
ये लोग अपने बच्चों के लिए उचित शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर सकते हैं। गरीबी उन्हें नशीली दवाओं/पदार्थों को सेवन करने, अपराध, गुंडागर्दी, पलायन, उदासीनता तथा अंततः सामाजिक बहिष्कार की ओर उन्मुख करती है।
(iii) भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइए।
उत्तर: भू-निम्नीकरण का अभिप्राय स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर भूमि की उत्पादकता में कमी है। भू-उर्वरता में कमी
अनेक कारणों से संभव है, जैसे-
(i) प्राकृतिक कारण। इसमें अनुउत्पादक भूमियाँ आती हैं, जैसे-प्राकृतिक खंड, मरुस्थलीय व रेतीली तटीय भूमि, बंजर चट्टानी भूमि, तीव्र ढाल वाली भूमि तथा हिमानी क्षेत्र आदि।
(ii) मानवजनित कारण – भूमि का कुप्रबंधन, भूमि का अविरल उपयोग, मृदा अपरदन को प्रोत्साहन देने वाली क्रियाएँ, जलाक्रांतता, लवणता व क्षारीयता में वृद्धि आदि।
भारत में कृषिरहित बंजर निम्नीकृत भूमि इसके कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 17.98% है जिसमें पहाड़ी क्षेत्र, पठारी क्षेत्र, खड्ड आदि के अलावा रेतीली तटीय व मरुस्थली भूमि प्राकृतिक रूप से कृषि कार्यों के योग्य नहीं है। कुछ भूमि जो मानवीय क्रियाओं के फलस्वरूप कृषियोग्य नहीं रह गयी है उसको नई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से फिर से कृषियोग्य बनाया जा सकता है। रेतीली मरुस्थली व तटीय भूमि को उर्वरकों, कम्पोस्ट व सिंचाई की सुविधा प्रदान करके उपयोगी बनाया जा सकता है। जलाक्रांत भूमि व दलदली भूमि को कुशल प्रबंधन से उपजाऊ बनाया जा सकता है।

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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 9 Planning and Sustainable Development in Indian Context (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) प्रदेशीय नियोजन का संबंध है
(क) आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास
(ख) क्षेत्र विशेष के विकास का उपागम
(ग) परिवहन जल तंत्र में क्षेत्रीय अंतर
(घ) ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
(ii) आई०टी०डी०पी० निम्नलिखित में से किस संदर्भ में वर्णित है?
(क) समन्वित पर्यटन विकास प्रोग्राम
(ख) समन्वित यात्रा विकास प्रोग्राम
(ग) समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम
(घ) समन्वित परिवहन विकास प्रोग्राम
(iii) इंदिरा गाँधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास के लिए इनमें से कौन-सा सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है
(क) कृषि विकास
(ख) पारितंत्र-विकास
(ग) परिवहन विकास
(घ) भूमि उपनिवेशन

उत्तर:
(i) (ख) क्षेत्र विशेष के विकास का उपागम
(ii) (ग) समन्वित जनजातीय विकास प्रोग्राम
(iii) (क) कृषि विकास

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
(i) भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के सामाजिक लाभ क्या हैं?
उत्तर: भरमौर जनजातीय क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम के लागू होने से प्राप्त सामाजिक लाभों में साक्षरता दर में तेजी से वृद्धि, लिंग अनुपात में सुधार तथा बाल-विवाह में कमी शामिल है। इस क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर 1971 में 1.88% से बढ़कर 2001 में 42.83% हो गई थी।
(ii) सतत पोषणीय विकास की संकल्पना को परिभाषित करें।
उत्तर: विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WECD) ने सतत पोषणीय विकास को 1987 ई० में अवर कॉमन फ्यूचर नामक रिपोर्ट में इस तरह परिभाषित किया था-“एक ऐसा विकास जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।”
(iii) इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र का सिंचाई पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा?
उत्तर: इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र के विस्तार से बोये गए क्षेत्र में विस्तार हुआ है तथा फसलों की सघनता में वृद्धि हुई है। यहाँ की पांरपरिक फसलों चना, बाजरा और ग्वार का स्थान गेहूँ, कपास,मूंगफली और चावल ने ले लिया है जोकि सघन सिंचाई का परिणाम है।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। यह कार्यक्रम देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में कैसे सहायक है?
उत्तर: सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम का शुभांरभ चौथी पंचवर्षीय योजना में हुआ। इसका उद्देश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना तथा सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों को विकसित करना था। किंतु बाद में इसमें सिंचाई परियोजनाओं भूमि विकास कार्यक्रमों, वनीकरण, चरागाह विकास तथा आधारभूत ग्रामीण अवसंरचना जैसे-विद्युत, सड़कों, बाज़ार, ऋण सुविधाओं व सेवाओं पर जोर दिया गया है। इन क्षेत्रों का विकास करने की रणनीतियों में समन्वित जल संभर विकास कार्यक्रम अपनाना शामिल है। इसके अलावा जल, मिट्टी, पौधों, मानव तथा पशु जनसंख्या के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन, पुन:स्थापन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
1967 ई० में योजना आयोग ने देश में 67 जिलों की पहचान पूर्ण या आंशिक सूखा संभावी जिलों के रूप में की है। 1972 ई० में सिंचाई आयोग ने 30% सिंचित क्षेत्र का मापदंड लेकर सूखा संभावी क्षेत्रों का परिसीमन किया है। इसके अंतर्गत राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा व तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार तथा तमिलनाडु की उच्च भूमि एवं आंतरिक भाग के शुब्क और अर्ध-शुष्क भागों में फैले हुए हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्र सिंचाई के प्रसार के कारण सूखे से बच जाते हैं।
(ii) इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाएँ।
उत्तर: इंदिरा गांधी नहर जिसे पहले राजस्थान नहर कहा जाता था, न केवल भारत में बल्कि विश्व के सबसे बड़े नहर तंत्रों में से एक है। 1948 ई० में कॅवर सेन द्वारा संकल्पित यह नहर परियोजना 31 मार्च 1958 ई० को प्रारंभ हुई। सतलुज एवं व्यास नदी के जल को पंजाब के हरिके नामक बाँध पर रोककर यह नहर निकाली गई है जिससे राजस्थान के थार मरुस्थल की 19.63 लाख हेक्टेयर कृषियोग्य कमान क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा प्रदान कर रही है। इस नहर तंत्र की कुल लंबाई 9060 किमी है। इस नहर का निर्माण कार्य दो चरणों में पूरा किया गया है। चरण-I के कमान क्षेत्र में सिंचाई की शुरुआत 1960 के दशक में जबकि चरण-II में सिंचाई 1980 के दशक के मध्य में आरंभ हुई थी। इस नहर के कमान क्षेत्र में सतत पोषणीय विकास को बढ़ावा देने वाले प्रस्तावित 7 उपायों में से पाँच उपाय पारिस्थितिकीय संतुलन को पुनः स्थापित करने पर बल देते हैं, जैसे
(i) जल प्रबंधन नीति का कठोरता से कार्यान्वयन करना ताकि फसल रक्षण सिंचाई व चरागाह विकास की व्यवस्था की जा सके।
(ii) इस क्षेत्र में जल सघन फसलों को नहीं बोया जाना चाहिए बल्कि बागाती कृषि में खट्टे फलों की खेती करनी चाहिए।
(iii) कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण होना चाहिए तथा मार्ग में बहते जल की क्षति को कम करने के उपाय किए जाने चाहिए; जैसे-नालों को पक्का करना, भूमि विकास तथा समतलन एवं बाड़बंदी पद्धति लागू करनी चाहिए।
(iv) जलाक्रांत (गहन सिंचाई से जलभराव) एवं लवणता से प्रभावित भूमि का पुनरुद्वार किया जाना चाहिए।
(v) वनीकरण, वृक्षों की रक्षण मेखला का विकास तथा चरागाह विकास के अलावा पारितंत्र-विकास पर जोर देना चाहिए।
(vi) इस क्षेत्र के आर्थिक रूप से कमजोर भू-आवंटियों को कृषि के लिए वित्तीय एवं संस्थागत सहायता मिलनी चाहिए।
(vii) केवल कृषि और पशुपालन के विकास से सतत पोषणीय विकास संभव नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों का भी यहाँ विकास किया जाना चाहिए ताकि कृषि सेवा केंद्रों और विपणन केंद्रों के बीच प्रकार्यात्मक संबंध बन सकें।

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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 8 Manufacturing Industries (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India: People and Economy Chapter 8 Manufacturing Industries (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) कौन-सा औद्योगिक अवस्थापनी का एक कारण नहीं है?
(क) बाज़ार
(ख) जनसंख्या घनत्व
(ग) पूँजी
(घ) ऊर्जा
(ii) भारत में सबसे पहले स्थापित की गई लौह-इस्पात कंपनी निम्नलिखित में से कौन-सी है?
(क) भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी (आई०आई०एस०सी०ओ०)
(ख) टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी (टी०आई०एस०सी०ओ०)
(ग) विश्वेश्वरैया लौह तथा इस्पात कारखाना
(घ) मैसूर लोहा तथा इस्पात कारखाना
(iii) मुंबई में सबसे पहला सूत्ती वस्त्र कारखाना स्थापित किया गया, क्योंकि
(क) मुंबई एक पत्तन है।
(ख) यह कपास उत्पादक क्षेत्र के निकट स्थित है।
(ग) मुंबई एक वित्तीय केंद्र था
(घ) उपर्युक्त सभी
(iv) हुगली औद्योगिक प्रदेश का केंद्र है
(क) कोलकाता-हावड़ा
(ख) कोलकाता रिशरा
(ग) कोलकाता-मेदजीपुर
(घ) कोलकाता-कोन नगर
(v) निम्नलिखित में से कौन-सी चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है?
(क) महाराष्ट्र
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) पंजाब
(घ) तमिलनाडु

उत्तर:
(i) (ख) जनसंख्या घनत्व
(ii) (ख) टाटा लोह एवं इस्पात कंपनी (टी०आई०एस०सी०ओ०)
(iii) (घ) उपर्युक्त सभी
(iv) (क) कोलकाता-हावड़ा
(v) (ख) उत्तर-प्रदेश

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) लोहा-इस्पात किसी देश के औद्योगिक विकास का आधार है, ऐसा क्यों?
उत्तर: लोहा-इस्पात उद्योग किसी देश में आधुनिक औद्योगिक विकास के लिए आधार प्रदान करता है। अन्य उद्योगों के लिए मशीनें, औजार तथा कच्चा माल लौह-इस्पात उद्योग से ही प्राप्त होता है। इसलिए इसे आधारभूत उद्योग अथवा औद्योगिकीकरण की कुंजी कहा जाता है।
(ii) सूती वस्त्र उद्योग के दो सेक्टरों के नाम बताइए। वे किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर: भारत में सूती वस्त्र उद्योग दो सेक्टरों में विभाजित हैं – (क) संगठित सेक्टर तथा (ख) विकेंद्रित सेक्टर।
संगठित सेक्टर में कपास से धागा बनाने से लेकर कपड़ा तैयार करने तक सभी कार्य एक ही कारखाने में विद्युतचालित करघों से होता है। जबकि विकेंद्रित सेक्टर में सूत कातने व कपड़ा बुनने का कार्य अलग-अलग इकाईयों द्वारा किया जाता है-इसमें हस्तचालित करघे व विद्युतचालित करघे दोनों शामिल हैं।
(iii) चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग क्यों है?
उत्तर: चीनी उद्योग के लिए महत्त्वपूर्ण कच्चा माल गन्ना है जोकि एक विशेष मौसम में ही प्राप्त होता है। उसके बाद इसकी आवक बंद हो जाती है, साथ ही चीनी उद्योगों में इसका उत्पादन भी।
(iv) पेट्रो-रासायनिक उद्योग के लिए कच्चा माल क्या है? इस उद्योग के कुछ उत्पादों के नाम बताइए।
उत्तर: पेट्रो-रासायनिक उद्योग के लिए खनिज तेल अथवा अपरिष्कृत पेट्रोल के प्रक्रमण से प्राप्त विभिन्न उत्पाद अथवा वस्तुएँ कच्चे माल के रूप में प्रयोग की जाती हैं। इस उद्योग के उत्पादों को चार वर्गों में रखा जाता है
(i) पॉलीमर, (ii) कृत्रिम रेशे, (ii) इलैस्टोमर्स तथा (iv) पृष्ठ संक्रियक।
(v) भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के प्रमुख प्रभाव क्या हैं?
उत्तर: सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है। इसने आर्थिक व सामाजिक रूपांतरण के लिए अनेक नई संभावनाएँ उत्पन्न कर दी हैं। भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग यहाँ की अर्थव्यवस्था में तेजी से विकसित हुए सेक्टरों में से एक है। भारतीय सॉफ्टवेयर तथा सेवा सेक्टर द्वारा 2004-05 में 78, 230 करोड़ रुपये मूल्य के बराबर निर्यात हुआ था जो कि लगातार वृद्धि कर रहा है।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) ‘स्वदेशी’ आंदोलन ने सूती वस्त्र उद्योग को किस प्रकार विशेष प्रोत्साहन दिया?
उत्तर: सूती वस्त्र उद्योग भारत के परंपरागत उद्योगों में से एक है। प्राचीन काल तथा मध्य काल में यह केवल कुटीर उद्योग की श्रेणी में रखा जाता था। फिर भी, भारत में निर्मित उत्कृष्ट कोटि का मलमल, कैलिको, छींट तथा अन्य प्रकार के सूती कपड़ों की विश्व स्तरीय माँग थी। 18वीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन के मानचेस्टर तथा लिवरपूल में सूती कपड़ों की मिलों की स्थापना होने के बाद कच्चे माल के रूप में कपास की भारी माँग होने लगी। भारत में ब्रिटिश शासकों ने भारत में उत्पादित कपास को इंग्लैंड भेजना आरंभ कर दिया। इस तरह भारतीय बुनकरों को कपास/कच्चे माल की उपलब्धता न होने पर स्वदेशी सूती वस्त्र उद्योग प्रभावित होने लगा। साथ ही ब्रिटेन की मिलों में तैयार कपड़े को भारत में बेचा जाने लगा जोकि अपेक्षाकृत सस्ता होता था। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश शासकों द्वारा भारी नुकसान पहुँचाया जाने लगा। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पहले मुंबई में तथा बाद में अहमदाबाद में सूती वस्त्र की मिल स्थापित की गईं। 1920 ई० में गाँधी जी के आह्वान पर स्वदेशी अंदोलन में भारतीय लोगों को स्वदेशी वस्त्र व अन्य वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया तथा ब्रिटेन में बने सामान का बहिष्कार किया। इससे भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। भारत में रेलमार्गों के विकास व विस्तार ने देश के दूसरे भागों में सूती वस्त्र केन्द्रों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। दक्षिण भारत में, कोयंबतूर, मदुरै व बंगलूरु में मिलों की स्थापना हुई; मध्य भारत में, नागपुर, इंदौर, शोलापुर व वडोदरा भी सूती वस्त्र के केंद्र बन गए। उत्तर भारत में कानपुर व कोलकाता में भी मिलों की स्थापना हुई। इस प्रकार, भारत के प्रत्येक राज्य में जहाँ अनुकूल परिस्थितियाँ थीं, सूती वस्त्र उद्योग स्थापित होते गए।
(ii) आप उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से क्या समझते हैं? इन्होंने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है?
उत्तर: भारत में नई औद्योगिक नीति की घोषणा 1991 ई० में की गई जिसके अंतर्गत औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण की नीति अपनाई गई है
उदारीकरण (Liberalisation) – इसका अर्थ है उद्योगों पर से प्रतिबंध हटाना। नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत औद्यौगिक लाइसेंस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। केवल सुरक्षा, सामरिक तथा पर्यावरणीय सरोकार से संबंधित केवल छः उद्योगों को इस व्यवस्था के लाभ से वंचित रखा गया है ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय उद्योग प्रतिस्पर्धा प्राप्त कर सकें।
निजीकरण (Privatisation) – इसका अर्थ है उद्योगों की स्थापना में सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी कम करके निजी/व्यक्तिगत भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। इस नीति के अंतर्गत 1956 ई० से सार्वजनिक सेक्टर के अधीन सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटाकर 4 कर दी गई है। देहली संपत्ति (Threshold) की सीमा समाप्त कर दी गई है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अनुमति दे दी गई।
वैश्वीकरण (Globalisation)- इसका अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना। इस व्यवस्था में समानता तथा पूँजी सहित सेवाएँ, श्रम व संसाधन एक देश से दूसरे देश में स्वतंत्रता पूर्वक पँहुचाए जा सकते हैं। नई औद्योगिक नीति के मुख्य उद्देश्यों के संदर्भ में इस नीति के लाभों को देखा जाना चाहिए जिनमें – (i) अब तक प्राप्त किए गए लाभ को बढ़ाना, (ii) इसमें विकृति अथवा कमियों को दूर करना, (iii) उत्पादकता और लाभकारी रोज़गार में स्वपोषित वृद्धि को बनाए रखना, (iv) अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता प्राप्त करना। धीरे-धीरे ही सही, भारत अपनी नई औद्योगिक नीति के द्वारा औद्योगिकी विकास के पथ पर अग्रसर होता दिखाई पड़ रहा है।

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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 5 Land Resources and Agriculture (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India: People and Economy Chapter 5 Land Resources and Agriculture (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।
(i) निम्न में से कौन-सा भू-उपयोग संवर्ग नहीं है?
(क) परती भूमि
(ख) सीमांत भूमि
(ग) निवल बोया क्षेत्र
(घ) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि
(ii) पिछले 40 वर्षों में वनों का अनुपात बढ़ने का निम्न में से कौन-सा कारण है?
(क) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास
(ख) सामुदायिक वनों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि
(ग) वन बढ़ोतरी हेतु निर्धारित अधिसूचित क्षेत्र में वृद्धि
(घ) वन क्षेत्र प्रबंधन में लोगों की बेहतर भागीदारी
(iii) निम्न में से कौन-सा सिंचित क्षेत्रों में भू-निम्नीकरण का मुख्य प्रकार है?
(क) अवनालिका अपरदन
(ख) वायु अपरदन
(ग) मृदा लवणता
(घ) भूमि पर सिल्ट का जमाव
(iv) शुष्क कृषि में निम्न में से कौन-सी फसल नहीं बोई जाती?
(क) रागी
(ख) ज्वार
(ग) मूंगफली
(घ) गन्ना
(v) निम्न में से कौन से देशों में गेहूं व चावल की अधिक उत्पादकता की किस्में विकसित की गई थीं?
(क) जापान तथा आस्ट्रेलिया
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान
(ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस
(घ) मैक्सिको तथा सिंगापुर

उत्तर:
(i) (ख) सीमांत भूमि
(ii) (क) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास
(iii) (ग) मृदा लवणता
(iv) (घ) गन्ना
(v) (ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस।

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए|
(i) बंजर भूमि तथा कृषियोग्य व्यर्थ भूमि में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर: बंजर भूमि-वह भूमि जो प्रचलित प्रौद्योगिकी की मदद से कृषियोग्य नहीं बनाई जा सकती, जैसे-बंजर, पहाड़ी भूभाग, मरुस्थल व खड्ड आदि। कृषि योग्य व्यर्थ भूमि-भूमि उद्धार तकनीक द्वारा इस भूमि को कृषियोग्य बनाया जा सकता है। यह वह भूमि है। जो पिछले पाँच या उससे अधिक वर्षों तक परती या कृषिरहित रही है।
(ii) निवल बोया गया क्षेत्र तथा सकल बोया गया क्षेत्र में अंतर बताएँ।
उत्तर: निवल बोया गया क्षेत्र-वह भूमि जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती हैं। उसे निवल बोया गया क्षेत्र अथवा शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहते हैं। सकल बोया गया क्षेत्र-यह कुल बोया गया क्षेत्र है। इसमें एक बार से अधिक बार बोये गए क्षेत्रफल को उतनी ही बार जोड़ा जाता है जितनी बार उस पर फसल उगायी जाती है। इस तरह सकल बोया गया क्षेत्र, शुद्ध बोया गये क्षेत्र से अधिक होता है।
(iii) भारत जैसे देश में गहन कृषि नीति अपनाने की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर: भारत में निवल बोए गए क्षेत्र में बढ़ोतरी की संभावनाएँ सीमित हैं। अत: भूमि बचत प्रौद्योगिकी विकसित करना आज अत्यंत आवश्यक है जिसमें प्रति इकाई भूमि में फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जाता है, साथ ही गहन भू-उपयोग से एक वर्ष में अधिकतम फसलें उगाई जाती हैं।
(iv) शुष्क कृषि तथा आर्द्र कृषि में क्या अंतर है?
उत्तर: शुष्क कृषि-यह कृषि भारत के उन शुष्क भू-भागों में की जाती है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेमी० से कम होती है। इन क्षेत्रों में शुष्कता को सहने में सक्षम रागी, बाजरा, मूंग, चना तथा ग्वार जैसी फसलें उगाई जाती हैं। आर्दै कृषि-इन क्षेत्रों में वे फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है; जैसे-चावल, जूट, गन्ना तथा ताजे पानी की जल कृषि। अधिक वर्षा के कारण ये क्षेत्र बाढ़ व मृदा अपरदन का सामना करते हैं।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) भारत में भू-संसाधनों की विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ कौन-सी हैं? उनका निदान कैसे किया जाए?
उत्तर: भारत में भू-संसाधनों का निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है जोकि कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों के कारण उत्पन्न हुई है। भू-संसाधनों का निम्नीकरण एक गंभीर समस्या इसलिए है क्योंकि इससे मृदा की उर्वरता क्षीण हो गई है। यह समस्या विशेषकर सिंचित क्षेत्रों में अधिक भयावह है जिसके निम्नलिखित कारण हैं
(1) कृषिभूमि का एक बड़ा भाग जलाक्रांतता, लवणता तथा मृदा क्षारता के कारण बंजर हो चुका है।
(2) अब तक लगभग 80 लाख हेक्टेयर भूमि लवणता व क्षारता से कुप्रभावित हो चुकी है तथा 70 लाख हेक्टेयर भूमि जलाक्रांतता के कारण अपनी उर्वरता खो चुकी है।
(3) कीटनाशकों, रसायनों के व रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा परिच्छेदिका में जहरीले तत्त्वों का सांद्रण बढ़ा है।
(4) सिंचित क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप में दलहन का विस्थापन हो चुका है तथा वहाँ बहु-फसलीकरण में बढ़ोतरी से परती भूमि का क्षेत्र कम हुआ है जिससे भूमि में पुनः उर्वरता पाने की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हुई है। (5) उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र क्षेत्रों में जल द्वारा मृदा अपन तथा शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन एक आम समस्या है।
ऊपर वर्णित सभी समस्याओं का निदान हम उपयुक्त प्रौद्योगिकी व तकनीक विकसित करके कर सकते हैं। साथ ही समस्याओं को जन्म देने वाले क्रियाकलापों को नियंत्रित करना भी बहुत जरूरी है।
(ii) भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कृषि विकास की महत्त्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।
उत्तर: स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारतीय कृषि एक जीविकोपार्जी अर्थव्यवस्था जैसी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाना था जिसके लिए निम्न उपाय अपनाए गए – (i) व्यापारिक फसलों के स्थान पर खाद्यान्न फसलों को उगाना,
(ii) कृषि गहनता को बढ़ाना तथा
(iii) कृषियोग्य बंजर तथा परती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करना। प्रारंभ में इस नीति से खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ा, लेकिन 1950 के दशक के अंत तक कृषि उत्पादन स्थिर हो गया था। इस समस्या से निपटने के लिए गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) तथा गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम, (IAAP) प्रारंभ किए गए। किंतु 1960 के दशक के मध्य में दो अकालों से देश में अन्न संकट उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप, दूसरे देशों से खाद्यान्नों का आयात करना पड़ा। साथ ही खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाने के लिए अन्य उपाय भी किए गए; जैसे
(1) मैक्सिको से गेहूँ तथा फिलीपींस से चावल की अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत किस्में मँगवाई गयीं। पैकेज प्रौद्योगिकी के रूप में सबसे पहले पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश व गुजरात के सिंचाई वाले क्षेत्रों में इन उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (HYV) को अपनाया गया। कृषि विकास की इस नीति से खाद्यान्नों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई जिसे हरित क्रांति नाम दिया गया। इस क्रांति ने कृषि में निवेश को प्रोत्साहन दिया जिसमें उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों, कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिला। 1980 के बाद यह प्रौद्योगिकी मध्य भारत तथा पूर्वी भारत के भागों तक फैल गयी।
(2) योजना आयोग ने 1988 में कृषि विकास में प्रादेशिक संतुलन को प्रोत्साहित करने हेतु कृषि जलवायु नियोजन आरंभ किया जिसमें कृषि, पशुपालन तथा जल कृषि के विकास पर बल दिया गया।
(3) 1990 के दशक में उदारीकरण नीति तथा उन्मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था ने भारतीय कृषि विकास को प्रभावित किया है। इससे ग्रामीण अवसंरचना विकास में कमी, फसलों के समर्थन मूल्यों तथा बीजों, कीटनाशकों व रासायनिक उर्वरकों पर छूट में कटौती की गई है। फिर भी भारतीय कृषि से उच्च उत्पादकता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है।

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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 7 Mineral and Energy Resources (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Geography India: People and Economy Chapter 7 Mineral and Energy Resources (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) निम्नलिखित में से किस राज्य में प्रमुख तेल क्षेत्र स्थित है?
(क) असम
(ख) बिहार
(ग) राजस्थान
(घ) तमिलनाडु
(ii) निम्नलिखित में से किस स्थान पर पहला परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किया गया था?
(क) कलपक्कम
(ख) नरोरा
(ग) राणाप्रताप सागर
(घ) तारापुर
(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज भूरा हीरा के नाम से जाना जाता है?
(क) लौह
(ख) लिगनाइट
(ग) मैंगनीज
(घ) अभ्रक
(iv) निम्नलिखित में कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है?
(क) जल
(ख) सौर
(ग) ताप
(घ) पवन

उत्तर:
(i) (क) असम
(ii) (घ) तारापुर
(iii) (ख) लिगनाइट
(iv) (ग) ताप

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) भारत में अभ्रक के वितरण का विवरण दें।
उत्तर: भारत में अभ्रक मुख्यतः झारखंड, आंध्र प्रदेश में राजस्थान से प्राप्त किया जाता है। इसके अलावा तमिलनाडु प० बंगाल तथा मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु व महाराष्ट्र में भी अभ्रक पाया जाता है। झारखंड के निचले हजारीबाग पठार व आंध्र प्रदेश में नेल्लोर जिले में सर्वोत्तम प्रकार के अभ्रक का उत्पादन होता है।
(ii) नाभिकीय ऊर्जा क्या है? भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केंद्रों के नाम लिखें।
उत्तर: रेडियोधर्मी पदार्थों जैसे यूरेनियम व थोरियम के संलयन से प्राप्त ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं। भारत में यूरेनियम व थोरियम के पर्याप्त भंडार हैं। भारत के प्रमुख नाभिकीय ऊर्जा केंद्र हैं-तारापुर (महाराष्ट्र), रोवत भाटा (राजस्थान), कलपक्कम (तमिलनाडु), नरोरा (उत्तर प्रदेश), कैगा (कर्नाटक) तथा काकरापारा (गुजरात)।
(iii) अलौह धातुओं के नाम बताएँ। उनके स्थानिक वितरण की विवेचना करें।
उत्तर: बॉक्साइट, ताँबा, सोना व चाँदी अलौह धातुएँ हैं। उड़ीसा बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र, कर्नाटक व तमिलनाडु भी बॉक्साइट के अन्य उत्पादक राज्य हैं। ताँबा मुख्यतः झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान राज्य में पाया जाता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व तमिलनाडु अन्य ताँबा उत्पादक राज्य है।
(iv) ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर: ये सतत पोषणीय ऊर्जा के नवीकरण योग्य स्रोत हैं, जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, ज्वारीय तथा तरंग ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा तथा जैव ऊर्जा आदि ऊर्जा अपारंपरिक स्रोत हैं। ये स्रोत पर्यावरण के अनुकूल हैं साथ ही कम खर्चीले व टिकाऊ हैं।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) भारत के पेट्रोलियम संसाधनों पर विस्तृत टिप्पणी लिखें।
उत्तर: भातर में व्यवस्थित ढंग से खनिज तेल का अन्वेषण तथा उत्पादन 1956 ई० में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग की स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ। उससे पहले असम में डिगबोई एकमात्र तेल उत्पादक केंद्र था जहाँ नहोर पोंग नामक स्थान पर 1857 ई० में भारत में पहला कुआँ खोदा गया था। हाल ही के वर्षों में देश के दूरतम पश्चिमी एवं पूर्वी तटों पर तेल के नए निक्षेप मिले हैं। इनमें डिगबोई, नहार कटिया तथा मोरान प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। गुजरात में अंकलेश्वर, कालोल, मेहसाणा, नवागाम, कोसांबा तथा लुनेज प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। मुंबई हाई, अरब सागर के अपतटीय क्षेत्र मुंबई से 160 कि०मी० दूर हैं, जिनमें 1976 ई० से उत्पादन प्रारंभ हुआ था। तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग को पूर्वी तट पर कृष्णा-गोदावरी तथा कावेरी के बेसिनों में यह अन्वेषणात्मक कूपों में पाया गया है। कूपों से निकाला गया तेल अपरिष्कृत तथा अनेक अशुद्धिओं से परिपूर्ण होता है। प्रयोग से पहले इसे शोधित करना पड़ता है। भारत में दो प्रकार के तेलशोधक कारखाने/रिफाइनरीज हैं – (क) क्षेत्र आधारित, (ख) बाजार आधारित। भारत में कुल 18 परिष्करण शालाएँ हैं-डिगबोई (क्षेत्र आधारित) तथा बरौनी (बाज़ार आधारित) तेलशोधक कारखाने हैं। खनिज तेल के शोधन के बाद इससे प्राप्त प्रमुख उत्पाद-पेट्रोलियम पदार्थ हैं जिनका उपयोग, मोटर-वाहनों, रेलवे तथा वायुयानों के अंतर-दहन ईंधन के रूप में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए होता है। इसके अनेक सह-उत्पाद पेट्रो-रसायन उद्योगों जैसे-उर्वरक, कृत्रिम रबर, कृत्रिम रेशे, दवाइयाँ, वैसलीन, स्नेहकों, मोम, साबुन तथा अन्य सौंदर्य
प्रसाधनों, में प्रक्रमित किए जाते हैं।
(ii) भारत में जल विद्युत पर एक निबंध लिखें।
उत्तर: जल विद्युत, ऊर्जा का असमाप्य परंपरागत स्रोत है जिसका उपयोग कृषि क्षेत्र, उद्योगों व घरेलू सेक्टरों में विभिन्न
उपकरणों व मशीनों को चलाने के लिए किया जाता है। विद्युत कई अन्य स्रोतों से भी उत्पन्न की जाती है, जिनमें ताप विद्युत व नाभिकीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। फिर इसे उपयोग हेतु, माँग वाले क्षेत्रों को विद्युत ट्रांसमिशन लाइनों के द्वारा भेज दिया जाता है। किंतु जल विद्युत, इन सबसे में सबसे महत्त्वपूर्ण विद्युत स्रोत है, क्योंकि – 1. भारत में जल विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक दशाएँ इसके अनुकूल हैं। जैसे यहाँ वर्षभर बहने वाली सदानीरा नदियाँ हैं। 2. हिमालय से निकलने वाली नदियों पर अनेक झरने, गॉर्ज व प्रपात मौजूद हैं, जहाँ विद्युत उत्पन्न करने के लिए प्राकृतिक दशाएँ मौजूद हैं। 3. दक्षिण भारत की नदियाँ भी अपने प्रवाह के पठारी भागों में ऐसी ही अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करती हैं। जहाँ बाँध बनाकर जल विद्युत उत्पन्न की जा सकती है।इनके अलाचा निम्नलिखित कारक भी इसके विकास में सहायक हैं
1. भारत में बाँध निर्माण के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी उपलब्ध है।
2. जल विद्युत केंद्र स्थापित करने से लेकर उपभोग क्षेत्रों तक विद्युत को पहुँचाने के लिए ट्रांसमिशन लाइनों का । विकास व विस्तार परम आवश्यक है। अनेक विद्युत स्टेशनों व सब स्टेशनों के निर्माण में भारी निवेश की | जरूरत होती है।/भारत में इसका नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।
3. विद्युत उपयोग के लिए विभिन्न उपकरणों व मशीनों के निर्माण के लिए औद्योगिक विकास व बाज़ार दोनों की आवश्यकता होती है। भारत में, धीरे-धीरे ही सही इनका विस्तार हो रहा है।
4. भारत में अनेक बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का विकास जल विद्युत प्राप्त करने व सिंचाई के लिए। नहरें विकसित करने के लिए किया गया है।
5. विद्युत को संरक्षित नहीं किया जा सकता इसलिए इसके उत्पादन का तुरंत उपयोग होना आवश्यक है अन्यथा | यह व्यर्थ चली जाती है। अत: इसके उत्पादन व माँग के बीच समन्वय होना जरूरी है।
6. भारत में प्रतिवर्ष 322 KWH शक्ति उत्पन्न की जाती है जबकि देश में कुल जलराशि से लगभग 90,000 बिलियन M.W. जल विद्युत प्राप्त करने की क्षमता है।
7. भारत में पहला जल विद्युत गृह कर्नाटक के शिव समुद्रम में स्थापित किया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में कई विद्युत ग्रिड स्थापित किए गए हैं। अब एक एकीकृत राष्ट्रीय ग्रिड का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इससे विद्युत आपूर्ति उन क्षेत्रों में संभव हो सकेगी जहाँ इसकी माँग है।

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NCERT Solutions for Class 12 Geography India People and Economy Chapter 6 Water Resources (Hindi Medium)

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अभ्यास प्रश्न (पाठ्यपुस्तक से)

प्र० 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए।
(i) निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?
(क) अजैव संसाधन
(ख) अनवीकरणीय संसाधन
(ग) जैव संसाधन
(घ) चक्रीय संसाधन
(ii) निम्नलिखित नदियों में से, देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौमजल संसाधन हैं?
(क) सिंधु
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गंगा
(घ) गोदावरी
(iii) घन कि०मी० में दी गई निम्नलिखित संख्याओं में से कौन-सी संख्या भारत में कुल वार्षिक वर्षा दर्शाती है?
(क) 2,000
(ख) 3,000
(ग) 4,000
(घ) 5,000
(iv) निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौमजल उपयोग (% में) इसके कुल भौमजल संभाव्य से ज्यादा है?
(क) तमिलनाडु
(ख) कर्नाटक
(ग) आंध्र प्रदेश
(घ) केरल
(v) देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?
(क) सिंचाई
(ख) उद्योग
(ग) घरेलू उपयोग
(घ) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर:
(i) (घ) चक्रीय संसाधन
(ii) (ग) गंगा
(iii) (ग) 4,000
(iv) (क) तमिलनाडु
(v) (क) सिंचाई

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।
(i) यह कहा जाता है कि भारत में जल-संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। साथ ही उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक, कृषि और घरेलू प्रदूषकों से प्रदूषित होता जा रहा है। इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता कम होती जा रही है।
(ii) पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु राज्यों में सबसे अधिक भौमजल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?
उत्तर: पंजाब, हरियाणा तथा तमिलनाडु राज्यों में भौमजल विकास सबसे अधिक इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इन प्रदेशों में कृषि के अंतर्गत उगाई जाने वाली फसलों को सिंचाई की आवश्यकता होती है। हरित क्रांति का शुभारंभ भी इन्हीं राज्यों से हुआ था साथ ही भौमजल की मात्रा भी इन राज्यों में सर्वाधिक है।
(iii) देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि का हिस्सा कम होने की संभावना क्यों है?
उत्तर: धीरे-धीरे ही सही भारत में औद्योगिकीकरण का स्तर बढ़ रहा है तथा कृषिक्षेत्र कम हो रहा है। नगरों के समीप की भूमि पर कृषि के अलावा अनेक आर्थिक गतिविधियों में भूमि उपयोग बढ़ने से कृषि भूमि सिकुड़ती जा रही है। अतः भविष्य में जल का उपयोग भी कृषि की अपेक्षा अन्य आर्थिक गतिविधियों में बढ़ने की संभावना है।
(iv) लोगों पर संदूषित जल/गंदे पानी के उपयोग के क्या संभव प्रभाव हो सकते हैं?
उत्तर: विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में एक-चौथाई संक्रामक रोग जल जनित हैं। संदूषित जल से उत्पन्न होने वाली बीमारियाँ हैं अतिसार, पीलिया, हैजा, रोहा, आंतों के कृमि आदि।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें।
(i) देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर: भारत में जल संसाधनों की उपलब्धता के चार मुख्य स्रोत हैं – (i) नदियाँ (ii) झीलें (iii) तलैया (iv) तालाब। यह जल वर्षण के विविध रूपों से प्राप्त होता है।
देश में एक वर्ष में वर्षण से प्राप्त कुल जलराशि की मात्रा लगभग 4,000 घन कि०मी० है। धरातलीय जल और पुनः पूर्तियोग्य भौमजल से 1,869 घन कि०मी० जल की उपलब्धता है। जिसका केवल 60% अर्थात् 1,122 घन कि०मी० का ही लाभदायक उपयोग किया जा सकता है। भारत में होने वाली वर्षा में अत्यधिक सामयिक व स्थानिक विभिन्नता पायी जाती है। कुल वर्षा का अधिकांश भाग मानसूनी मौसम तक संकेद्रित है। गंगा, ब्रह्मपुत्र व बराक नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है जोकि भारत का एक-तिहाई क्षेत्रफल है। किंतु यहाँ । कुल धरातलीय जल-संसाधनों का 60% जल पाया जाता है। दक्षिण भारतीय नदियाँ जैसे-गोदावरी, कृष्णा व कावेरी में जल प्रवाह का अधिकतर भाग उपयोग में लाया जा रहा है जबकि गंगा व ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में यह अभी तक संभव नहीं हो पाया है। नदियों में जल प्रवाह उनके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार तथा उनके जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है। भारत में नदियों व उनकी सहायक नदियों की कुल संख्या 10,360 है। इनमें 1,869 घन कि०मी० वार्षिक जल
प्रवाह होने का अनुमान है जिसका केवल 32% अर्थात् 690 घन कि०मी० जल का उपयोग किया जा सकता है।
(ii) जल संसाधनों का ह्रास सामाजिक द्वंद्वों और विवादों को जन्म देते हैं। इसे उपयुक्त उदाहरणों सहित समझाइए।
उत्तर: जल एक नवीकरणीय चक्रीय प्राकृतिक संसाधन है जोकि पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है किंतु पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 3% ही अलवणीय अर्थात् मानव के लिए उपयोगी है, शेष 97% जल लवणयुक्त अथवा खारा है जो केवल नौ संचालन व मछली पकड़ने के अलावा मानव के लिए प्रत्यक्ष उपयोग में नहीं आता। अलवणीय जल की उपलब्धता भी स्थान और समय के अनुसार भिन्न-भिन्न है। इसलिए इस दुर्लभ संसाधन के आवंटन और नियंत्रण को लेकर समुदायों, राज्यों तथा देशों के बीच द्वंद्व, तनाव व लड़ाई-झगड़े तथा विवाद होते रहे हैं। जैसे|
(i) पंजाब, हरियाण व हिमाचल प्रदेश में बहने वाली नदियों के जल बँटवारे को लेकर विवाद।
(ii) नर्मदा नदी के जल को लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व गुजरात राज्यों में विवाद।
(iii) कावेरी नदी के जल बँटवारे को लेकर केरल, तमिलनाडु व कर्नाटक राज्यों में विवाद।
जनसंख्या के बढ़ने के साथ-साथ जल की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। उपलब्ध जल औद्योगिक, कृषि व घरेलू निस्सरणों से प्रदूषित होता जा रहा है अतः उपयोगी, शुद्ध जल संसाधनों की उपलब्धता और सीमित होती जा रही है।
(iii) जल-संभर प्रबंधन क्या है? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है?
उत्तर: जल-संभर प्रबंधन का संबंध, मुख्य रूप से धरातलीय तथा भौमजल संसाधनों के कुशल व दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते वर्षा जल को विभिन्न विधियों द्वारा रोककर अंत:स्रवण, तालाब, पुनर्भरण तथा कुओं आदि के द्वारा भौमजल का संचयन और पुनर्भरण करना शामिल है। जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकृतिक जल संसाधनों और समाज की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है। कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने में सफल हुई हैं। जैसे
1. हरियाली-केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को पीने, सिंचाई, मत्स्यपालन और वन रोपण के लिए जल-संभर विधि से जल का संरक्षण करना है। यह परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है।
2. नीरू-मीरू (जल और आप )-यह कार्यक्रम आंध्रप्रदेश में तथा अरवारी पानी संसद (अलवर राजस्थान में) लोगों के सहयोग से चलाई जा रहे हैं जिनमें जल संग्रहण के लिए संरचनाएँ जैसे अंत:स्रवण, तालाब, ताल
(जोहड़) की खुदाई की गई हैं तथा रोक बाँध बनाए गए हैं।
3. तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना का निर्माण आवश्यक बना दिया गया है।
4. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित रालेगॅन सिद्धि एक छोटा-सा गाँव है। यह पूरे देश में जल-संभर विकास का एक जीवंत उदाहरण है। देश में लोगों को जल-संभर विकास प्रबंधन के लाभों को बताकर उनमें जागरूकता पैदा करके जल की उपलब्धता को सतत पोषणीय विकास से जोड़ा जा सकता है।

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