Author name: Raju

NCERT Solutions for Class 6 Social Science Civics Chapter 4 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 6 Social Science Civics Chapter 4 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 6 Social Science Civics Chapter 4 Key Elements of a Democratic Government (Hindi Medium)

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पाठ्यपुस्तक के आंतरिक प्रश्न

1. अश्वेत लोग किस-किस तरह से भेदभाव का सामना कर रहे थे, इसकी सूची बनाइए। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तकं, पेज-41)
उत्तर अश्वेत लोग निम्नलिखित प्रकार के भेदभाव का सामना कर रहे थे –

  1. अश्वेत लोगों को वोट डालने का अधिकार नहीं था।
  2. अश्वेत लोगों के लिए रेल एवं बसे अलग होती थीं।
  3. अस्पताल और अस्पताल की गाड़ियाँ भी अलग होती थी।
  4. अश्वेत लोगों को खेती के लिए सबसे घटिया जमीन मिली हुई थी, जबकि अच्छी जमीन श्वेत लोगों के पास थी।
  5. अश्वेत लोगों के लिए बस स्टैंड भी अलग थे।

2. हेक्टर और उसके साथी किस बात के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-41)
उत्तर स्कूल में हेक्टर और अन्य विद्यार्थियों पर अफ्रीकान्स भाषा सीखने के लिए दबाव डाला जा रहा था। अफ्रीकान्स भाषा वहाँ पर श्वेत लोगों द्वारा बोली जाती थी। हेक्टर और उसके सहपाठियों ने मिलकर अफ्रीकान्स भाषा सिखाने का विरोध किया, क्योंकि वे अपनी भाषा ‘जूलू’ सीखना चाहते थे।

3. क्या सभी लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार होना जरूरी हैक्यों? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-41)
उत्तर सभी लोग जन्म से समान हैं। उन्हें जीवन, स्वतंत्रता व संपत्ति का अधिकार है। यदि त्वचा के रंग, जाति, धर्म, भाषा आदि के आधार पर उनके अधिकारों को छीना जाता है तो यह भेदभाव कहलाता है। भेदभाव के कारण कोई भी मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास नहीं कर सकता है और यह मानवता के प्रति अपराध भी है और अन्याय भी है।

4. कुछ अखबार देखिए और उनमें दी गई चुनाव की खबरों पर चर्चा कीजिए। एक निर्धारित समय के बाद चुनाव होते रहने की क्या ज़रूरत है? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-41)
उत्तर सभी सरकारों का चुनाव एक निश्चित समय के लिए किया जाता है। भारत में यह समय पाँच वर्ष है। यदि सरकार का चुनाव निश्चित समय के लिए न करके हमेशा के लिए कर दिया जाए तो सरकारें अपनी मनमानी करने लगे, क्योंकि सरकार को बदल जाने का डर नहीं रहेगा। निर्धारित समय के बाद चुनाव होते रहने से लोगों का सरकार पर नियंत्रण बना रहता है।

5. यहाँ किस पर सहमति या असमति प्रकट की जा रही है? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-42)
उत्तर

  • सहमति – बाढ़ पीड़ितों को मुआवजा देना।
  • असहमति – दीवारों पर पोस्टर चिपकाने पर , बाघों के शिकार पर।

6. माया की कहानी को दोबारा पढ़िए। क्या आपको लगता है कि पुलिस द्वारा की गई हेक्टर की हत्या को रोका जा सकता था? कैसे? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-44)
उत्तर हेक्टर की हत्या को रोका जा सकता था अगर सरकार और विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग आपस में मिलकर समस्या पर विचार-विमर्श करते।

7. माया की कहानी में सरकार ने क्या इस विचार पर समर्थन किया था कि सभी लोग बराबर हैं? डॉ. अंबेडकर की कहानी में क्या अस्पृश्यता के व्यवहार से समानता के विचार को ठेस पहुँची? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-45 )
उत्तर माया की कहानी में सरकार ने समानता के विचार का समर्थन नहीं किया। डॉ. अंबेडकर की कहानी में अस्पृश्यता के व्यवहार से समानता के विचार को ठेस पहुँची।

8. आपके अनुसार फीस घटा देने से लड़कियों को स्कूल जाने में कैसे मदद मिलेगी? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-46)
उत्तर अधिकतर अभिभावक लड़कियों की पढ़ाई पर अधिक पैसा खर्च करना नहीं चाहते हैं, इसलिए वे लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते हैं। यदि फीस कम कर दी जाएगी तो संभव है कि अभिभावक लड़कियों को भेजने को तैयार हो जाएँ।

9. क्या आपने किसी के साथ कोई भेदभाव होते देखा है? उदाहरण देकर बताइए कि

  • इस स्थिति में आपने उसकी क्या मदद की?
  • क्या अन्य लोग भी आपसे सहमत थे?
  • जो लोग भेदभावे कर रहे थे उन्हें आपने कैसे समझाया? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-46)

उत्तर छात्र स्वयं करें।

प्रश्न-अभ्यास
(पाठ्यपुस्तक से)

1. आज दक्षिण अफ्रीका में माया को जीवन कैसा होगा?
उत्तर आज दक्षिण अफ्रीका एक लोकतांत्रिक देश है और सभी प्रजातियों के लोगों को बराबर माना जाता है, इसलिए आज माया का जीवन सुखमय होगा तथा उसे वे सभी अधिकार मिले होंगे जो श्वेतों को प्राप्त हैं।

2. किन विभिन्न तरीकों से लोग सरकार की प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं?
उत्तर
लोग सरकार की प्रक्रियाओं में निम्नलिखित तरीकों से भाग लेते हैं –

  • लोग वोट देकर अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। ये प्रतिनिधि सरकार बनाते हैं। इस प्रकार वोट देकर लोग सरकार की प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं।
  • लोग सरकार के कार्यों में रुचि लेकर और उसकी आलोचना करके भी अपनी भागीदारी निभाते हैं।
  • लोग सरकार के प्रति अपनी राय को धरने, जुलूस, हड़ताल आदि तरीकों से व्यक्त करते हैं ताकि सरकार की जो बातें गलत हैं और न्यायसंगत नहीं हैं उन्हें सामने लाया जा सके।
  • लोग समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन आदि के माध्यम से भी अपने विचार सरकार के सामने रख सकते हैं और सरकार उनके विचारों के अनुसार अपने कानून बना सकती है।
  • लोग आंदोलन करके सरकार और उसके काम करने के तौर-तरीके को चुनौती दे सकते हैं।

3. विभिन्न विवादों और मुद्दों को सुलझाने के लिए सरकार की जरूरत क्यों होती है?
उत्तर विवाद तब उभरता है जब विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, क्षेत्रों और आर्थिक पृष्ठभूमियों के लोग एक-दूसरे के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। ऐसा तब भी होता है जब कुछ लोगों को लगता है कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। लोग अपने विवादों को खत्म करने के लिए हिंसात्मक तरीके भी अपनाते हैं जिससे अन्य लोगों में भय और असुरक्षा की भावना फैलती है। सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह विवादों का
समाधान करे।

4. सभी लोगों के साथ समानता का व्यवहार हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है?
उत्तर लोकतांत्रिक सरकार न्याय और समानता के प्रति वचनबद्ध होती है। न्याय और समानता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। न्याय तभी प्राप्त हो सकता है जब सब लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार हो। सरकार उन समूहों के लिए विशेष प्रावधान करती है जो समाज में आज भी बराबर नहीं माने जा रहे जैसे अस्पृश्यता यानी छुआछूत की प्रथा पर अब कानून द्वारा रोक लगा दी गई है।

5. पाठ को एक बार और पढ़कर लोकतांत्रिक सरकार के मुख्य तत्त्वों की एक सूची बनाइए। उदाहरण के लिए सभी लोग बराबर हैं।
उत्तर
लोकतांत्रिक सरकार के मुख्य तत्त्व –

  • किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं।
  • आम सुविधाओं का प्रयोग करने का सबको अधिकार।
  • सभी लोगों को मतदान का अधिकार।
  • सभी लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति तथा धर्म का पालन करने तथा विकास करने का अधिकार।
  • न्याय और समानता के प्रति वचनबद्धता।

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NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 Vital Villages, Thriving Towns (Hindi Medium)

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पाठ्यपुस्तक के आंतरिक प्रश्न

1. लोहे की ऐसी पाँच चीज़ों की सूची बनाओ जिनका प्रयोग तुम रोज़ करते हो।
उत्तर : प्रतिदिन प्रयोग होने वाली लोहे की चीजें- (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-87)

  1. कुर्सी
  2. पेंचकस
  3. हथौड़ा
  4. तवा
  5. चिमटा

2. इस कहानी में आए व्यक्तियों के व्यवसायों की सूची बनाओ। प्रत्येक के लिए यह तय करो कि वे
(क) शहर में,
(ख) गाँव में, या फिर
(ग) शहर तथा गाँव
दोनों में रहते थे। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-90)
उत्तर :
NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 (Hindi Medium) 1

3. घोड़े का व्यापारी शहर में क्यों आया होगा? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-90)
उत्तर : घोड़े का व्यापारी शहर में घोड़े बेचने के लिए आया होगा।

4. क्या महिलाएँ कहानी में बताए व्यवसायों को अपना सकती थीं? उत्तर के कारण बताओ। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-90)
उत्तर : महिलाएँ कहानी में बताए व्यवसायों को नहीं अपना सकती थी क्योंकि वे घरेलू कार्यों में व्यस्त रहती थीं
तथा घर से बाहर कम ही निकलती थीं।

5. साँची की मूर्तिकला। यह मध्य प्रदेश स्थित साँची के स्तूप की मूर्तिकला का नमूना है। इसमें शहर के जीवन का एक दृश्य है। तुम अध्याय 12 में साँची के बारे में पढ़ोगे। इन दीवारों को देखो। क्या । वे ईंट की बनी हैं या फिर लकड़ी या पत्थर से? ( एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-91)
उत्तर : ये दीवारें तराशे हुए पत्थरों से बनी है।

6. क्या इसकी रेलिंग लकड़ी की बनी हैं? इन इमारतों की छतों का वर्णन करो। ( एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-91)
उत्तर : हाँ, इसकी रेलिंग लकड़ी की बनी है। इन इमारतों की छतों को बनाने के लिए पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया है।

7. बेरिगाज़ा से आयात और निर्यात होने वाली चीज़ों की सूची बनाओ। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-92)
उत्तर : बेरिगाज़ा में आयात होने वाली चीजें- बेरिगाजा में शराब, ताँबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, कपड़े, सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात होता था। बेरिगाजा से निर्यात होने वाली चीजें-हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, हाथी-दाँत गोमेद, कार्नीलियन, सूती कपड़ा, रेशम तथा इत्र बेरिंगाजा से निर्यात किए जाते थे।

8. दो ऐसी चीजें बताओ, जिनका उपयोग हड़प्पा युग में नहीं होता था। ( एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-92)
उत्तर : हड़प्पा युग में घोड़े तथा रागी (एक प्रकार का अनाज) का प्रयोग नहीं किया जाता था।

9. व्यापारी किस चीज़ से इसका विनिमय करते हैं? ( एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-93 )
उत्तर : व्यापारी नमक से सफेद धान का विनियम करते हैं।

10. वे किस तरह यात्रा कर रहे हैं? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-93)
उत्तर : व्यापारी रेतीले रास्ते पर गाड़ियों से यात्रा कर रहे हैं।

11. मथुरा के लोगों के व्यवसायों की एक सूची बनाओ। एक ऐसे व्यवसाय का नाम बताओ जो हड़प्पा में नहीं था। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-94)
उत्तर : मथुरा के लोग मूर्तिकार, बुनकर, लोहार, टोकरी बनाने वाले, माला बनाने वाले, इत्र बनाने वाले जैसे व्यवसाय में संलग्न थे। इत्र बनाने का व्यवसाय हड़प्पा युग में नहीं था।

12. उन महिलाओं की सूची बनाओ जिन्हें निरीक्षक नियुक्त कर सकता था। (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-95)
उत्तर : जिन महिलाओं को निरीक्षक नियुक्त किया जा सकता था वे इस प्रकार है

  1. विधवाएँ
  2. सक्षम-अक्षम महिलाएँ
  3. भिक्खुणियों
  4. वृद्धा वेश्याओं
  5. अवकाश प्राप्त दास और दासियाँ।
  6. अवकाश प्राप्त देवदासियाँ

13. क्या काम करने के दौरान महिलाओं को मुश्किलें झेलनी पड़ती थीं? ( एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-95)
उत्तर : काम करने के दौरान महिलाओं को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ती थी और अगर औरत ने अपना काम समय से पूरा नहीं किया, तो उसे जुर्माना देना पड़ता था। जुर्माने के रूप में अँगूठा तक भी काटा जा सकता था।

14. रोम के साथ संबंध दर्शाने वाले साक्ष्य की सूची बनाओ। । (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-96)
उत्तर : रोम के साथ संबंध दर्शाने वाले साक्ष्य

  1. भूमध्य-सागरीय क्षेत्र के एंफोरा जैसे पात्र मिले हैं।
  2. एरेटाइन’ जैसे मुहर लगे लाल-चमकदार बर्तन भी मिले हैं।
  3. रोमन लैंप, शीशे के बर्तन तथा रत्न मिले हैं।

अन्यत्र (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-96)

मानचित्र 6 (पृष्ठ 84) में रोम को ढूँढो। यह यूरोप के सबसे पुराने शहरों में से एक है। इसका विकास लगभग । तभी हुआ, जब गंगा के मैदान के शहर बस रहे थे। रोम एक बहुत बड़े साम्राज्य की राजधानी था। यह यूरोप, उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया तक फैला साम्राज्य था। इसके सबसे महत्त्वपूर्ण शासकों में से एक ऑगस्टस ने करीब 2000 साल पहले शासन किया था। उसने कहा था कि रोम ईंटों का शहर था, जिसे मैंने संगमरमर का बनवाया।
ऑगस्टस और उसके बाद के शासकों ने कई मंदिर तथा महल भी बनवाए। ऑगस्टस ने बड़े-बड़े रंगमंडल (एम्फिथियेटर) बनवाए। इनमें चारों तरफ दर्शकों के बैठने की सीढ़ीनुमा जगहें होती थीं। यहाँ लोग विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम देख सकते थे। उन्होंने स्नानागार भी बनवाए जहाँ स्त्रियों तथा पुरुषों के लिए अलग-अलग समय निर्धारित थे। यहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते थे, और आराम करते थे। बड़े-बड़े जलवाही सेतु (एक्वाडक्ट) के ज़रिए शहर के स्नानागारों, फव्वारों तथा गुसलखानों के लिए पानी लाया जाता था।
NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 (Hindi Medium) 3
ये बड़े खुले रंगमंडल (एम्फिीथियेटर) और जलवाही सेतु इतने दिनों तक कैसे बचे रहे?
उत्तर : रंगमंडल (एम्फिीथियेटर) और जलवाही सेतु बनाने में उत्तम इंजीनियरिंग तथा वस्तुओं का प्रयोग किया गया था जो हर मौसमी परिवर्तन को सहन करने में पूर्ण रूप से सक्षम थी जिस कारण से इनका अस्तित्व आज तक कायम है।

कल्पना करो

तुम बेरिगाज़ा में रहते हो और पत्तन देखने निकले हो। तुमको क्या-क्या देखने को मिला?
उत्तर : बेरिगाज़ा की संकरी खाड़ी में समुद्र से आने वाली नावों को चलाना नाविकों के लिए बहुत मुश्किल होता था। यहाँ कुशल और स्थानीय मछुआरे ही नाव तथा जहाजों को पत्तन तक ला पाते थे। यहाँ पर शराब, ताँबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, कपड़े, सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात हो रहा था, जबकि हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, हाथी दाँत, गोमेद, कार्नीलियन, सूती कपड़ा, रेशम तथा इत्र जैसी वस्तुओं का यहाँ से निर्यात किया जा रहा था।

प्रश्न-अभ्यास
पाठ्यपुस्तक से

आओ याद करें
1. खाली जगहों को भरो :
(क) तमिल के बड़े भूस्वामी को ……………………….. कहते थे।
(ख) ग्राम-भोजकों की जमीन पर प्रायः ……………………….. द्वारा खेती की जाती थी।
(ग) तमिल में हलवाहे को ……………………….. कहते थे।
(घ) अधिकांश गृहपति ……………………….. भूस्वामी होते थे।

उत्तर :

(क) वेल्लला
(ख) दास और मजदूरों
(ग) उणवार
(घ) स्वतंत्र व छोटे।

2. ग्राम-भोजकों के काम बताओ। वे शक्तिशाली क्यों थे?
उत्तर : ‘ग्राम-भोजक’ के पद पर आमतौर पर गाँव का सबसे बड़ा भू-स्वामी होता था। साधारणतया इनकी जमीन पर इनके दास और मजदूर काम करते थे। इसके अतिरिक्त प्रभावशाली होने के कारण प्रायः राजा भी कर वसूलने का काम इन्हें ही सौंप देते थे। ये न्यायाधीश का और कभी-कभी पुलिस का काम भी करते थे।

3. गाँवों तथा शहरों दोनों में रहने वाले शिल्पकारों की सूची बनाओ।
उत्तर : बढ़ई, बुनकर, कुम्हार, सुनार, मूर्तिकार जैसे शिल्पकार गाँव व शहर दोनों जगह रहते थे।

4. सही जवाब ढूंढो :
(क) वलयकूप का उपयोग

  1. नहाने के लिए
  2. कपड़े धोने के लिए।
  3. सिंचाई के लिए
  4. जल निकास के लिए किया जाता था।

(ख) आहत सिक्के

  1. चाँदी
  2. सोना
  3. टिन
  4. हाथी दाँत के बने होते थे।

(ग) मथुरा महत्त्वपूर्ण

  1. गाँव
  2. पत्तन
  3. धार्मिक केंद्र
  4. जंगल क्षेत्र था।

(घ) श्रेणी

  1. शासकों
  2. शिल्पकारों
  3. कृषकों
  4. पशुपालकों का संघ होता था।

उत्तर :  (क) 4. जल निकास के लिए किया जाता था।
(ख) 1. चाँदी
(ग) 3. धार्मिक केंद्र
(घ) 2. शिल्पकारों

आओ चर्चा करें

5. पृष्ठ 87 पर दिखाए गए लोहे के औजारों में कौन खेती के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे? अन्य औज़ार किस काम में आते होंगे?
NCERT Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 9 (Hindi Medium) 2

उत्तर : खेती के लिए महत्त्वपूर्ण औजार कुल्हाड़ी तथा हँसिया थे। किसी वस्तु को बिना छुए हुए पकड़ने के लिए सँड़सी का प्रयोग किया होगा।

6. अपने शहर की जल निकास व्यवस्था की तुलना तुम उन शहरों की व्यवस्था से करो, जिनके बारे में तुमने पढ़ा है। इनमें तुम्हें क्या-क्या समानताएँ और अंतर दिखाई दिए?
उत्तर : हमारे शहर में जल निकास व्यवस्था को योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया है। इसी तरह की जल निकास व्यवस्था को हमारे पढ़े गए शहरों में अपनाया गया था। ये दोनों व्यवस्थाएँ अनेक प्रकार से समान थी, लेकिन इन दोनों व्यवस्थाओं में केवल । एक ही अंतर था कि हमारी व्यवस्था आधुनिक है, जबकि वह व्यवस्था प्राचीन । थी। प्राचीन जल निकास व्यवस्था में कीचड़, ईंट और फैंस का प्रयोग किया जाता था जो लंबे समय तक काम नहीं कर सकती थी, लेकिन आज की व्यवस्था मजबूत चीजों से तैयार की गयी है तथा लंबे समय तक उपयोग में लाई जा सकती है।

आओ करके देखें

7. अगर तुमने किसी शिल्पकार को काम करते हुए देखा है तो कुछ वाक्यों में उसका वर्णन करो। ( संकेत : उन्हें कच्चा माल कहाँ से मिलता है, किस तरह के औजारों का प्रयोग करते हैं, तैयार माल का क्या होता है, आदि)
उत्तर : मैंने बढ़ई शिल्पकार को काम करते देखा है। वह लकड़ी के रूप में कच्चा टिंबर मार्किट से खरीदता है। टिंबर मार्किट में लकड़ी वनों से काटकर लायी जाती है। वह कई प्रकार के औजार; जैसे-लकड़ी घिसने वाला रंदा, लकड़ी काटने वाली आरी, छेद करने वाला, हथौड़ी का प्रयोग करता है। तैयार माल के रूप में मेज, कुर्सी, पलंग, दीवान इत्यादि होते हैं।

8. अपने शहर या गाँव के लोगों के कार्यों की एक सूची बनाओ। मथुरा में किए जाने वाले कार्यों से ये कितने समान और कितने भिन्न हैं?
उत्तर : मैं शहरों के परिवारों में स्त्री और पुरुष दोनों को काम करते हुए देखता हूँ। स्त्रियाँ और पुरुष दोनों दफ्तरों और अन्य स्थानों पर काम करते हैं। मथुरा यातायात और व्यापार के दो मुख्य रास्तों पर स्थित था तथा वह एक धार्मिक केंद्र भी था। मथुरा बेहतरीन मूर्तियाँ बनाने का भी केंद्र था।

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NCERT Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1

NCERT Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 11 Geography Indian Physical Environment Chapter 1 India Location (Hindi Medium)

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[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED] (पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न)

प्र० 1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
(i) निम्नलिखित में से कौन-सा अक्षांशीय विस्तार भारत की संपूर्ण भूमि के विस्तार के संदर्भ में प्रासंगिक है?
(क) 8° 41′ उत्तर से 35° 7′ उत्तर
(ख) 8° 4′ उत्तर से 35° 6′ उत्तर
(ग) 8° 4′ उत्तर से 37° 6′ उत्तर
(घ) 6° 45′ उत्तर से 37°6′ उत्तर
उत्तर- (ग) 8° 4′ उत्तर से 37°6′ उत्तर

(ii) निम्नलिखित में से किस देश की भारत के साथ सबसे लंबी स्थलीय सीमा है?
(क) बांग्लादेश
(ख) पाकिस्तान
(ग) चीन
(घ) म्यांमार
उत्तर- (क) बांग्लादेश

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से
बड़ा है?
(ख) फ्रांस
(क) चीन
(ग) मिस्र
(घ) ईरान
उत्तर- (क) चीन

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?
(क) 69° 30′ पूर्व
(ख) 75° 30′ पूर्व
(ग) 82° 30′ पूर्व
(घ) 90° 30′ पूर्व
उत्तर- (ग) 82° 30′ पूर्व

(v) अगर आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किस एक को आप पार नहीं करेंगे?
(क) यमुना
(ख) सिंधु
(ग) ब्रह्मपुत्र
(घ) गंगा
उत्तर- (ख) सिंधु

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
उत्तर- हाँ भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है क्योंकि देशांतर रेखाओं के मानों से स्पष्ट होता है कि इनमें लगभग 30 डिग्री का अंतर है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी व पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर होता है। कुछ ऐसे देश हैं, जिनमें अधिक पूर्व पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरणस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका में सात मानक समय तथा सोवियत संघ में 11 मानक समय निर्धारित किए गए हैं।

(ii) भारत की लंबी तटरेखा के क्या प्रभाव हैं?
उत्तर- भारत की तटरेखा 7517 कि.मी. लंबी है। भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा है, जिसके कारण यहाँ मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, विशाखापट्नम, कोच्चि, तुतिकोरिन, मर्मगांव, मंगलुरु, कांडला, पारादीप, हल्दिया जैसे बड़े-बड़े बंदरगाह का विकास हुआ है, जिनके द्वारा दूसरे देशों से समुद्री मार्गों से व्यापार होता है। भारत में लंबी तटरेखा होने के कारण भारत विश्व में मछली उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके अतिरिक्त समुद्री संसाधनों में खनिज तेल, नमक, मोती, मूंगा आदि की भी प्राप्ति होती है।

(iii) भारत का देशांतरीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?
उत्तर- भारत 68° पूर्वी देशांतर से 97° पूर्वी देशांतर के बीच फैला हुआ है। अर्थात् भारत का देशांतरीय विस्तार 30° है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी और सबसे पश्चिमी भागों के बीच लगभग 2 घंटे का अंतर पैदा करता है। इसलिए गुजरात की अपेक्षा अरुणाचल प्रदेश में दो घंटे पहले सूर्योदय होता है और गुजरात में अरुणाचल प्रदेश की तुलना में दो घंटे बाद सूर्यास्त होता है। इन दोनों क्षेत्रों के सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में अंतर होने के बावजूद घड़ी के समय में अंतर नहीं होता।

(iv) जबकि पूर्व में, उदाहरणतः नागालैंड में, सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती हैं?
उत्तर- नागालैंड में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है लेकिन नई दिल्ली में सूर्योदय और सूर्यास्त बाद में होता है। लेकिन समय दोनों स्थान पर एक ही होता है। इसका मुख्य कारण है कि भारत के विभिन्न स्थानों के समय में अंतर न हो इसके लिए एक मानक समय 82° 30′ पर खींची गई है जो इलाहाबाद के पास से गुजरती है। इसलिए भारत के विभिन्न स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में अंतर होने के बावजूद घड़ी के समय में अंतर नहीं होता। उत्तर- छात्र स्वयं करें।

प्र० 3. परिशिष्ट-I पर आधारित क्रियाकलाप (इस अभ्यास को समझाने व विद्यार्थियों से करवाने में अध्यापक सहायता कर सकते हैं)
(i) एक ग्राफ़ पेपर पर मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, गोवा, केरल तथा हरियाणा के जिलों की संख्या को आलेखित कीजिए। क्यों जिलों की संख्या का राज्यों के क्षेत्रफल से कोई संबंध है?
(ii) उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा, राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में से कौन-सा राज्य सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला और कौन-सा एक न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला है?
(iii) राज्य के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या के बीच संबंध को हुँढिए।
(iv) तटीय सीमाओं से संलग्न राज्यों की पहचान कीजिए।
(v) पश्चिम से पूर्व की ओर स्थलीय सीमा वाले राज्यों का क्रम तैयार कीजिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।

प्र० 4. परिशिष्ट-II पर आधारित क्रियाकलाप (इस अभ्यास को समझाने व विद्यार्थियों से करवाने में अध्यापक सहायता कर सकते हैं)
(i) उन केंद्र शासित क्षेत्रों की सूची बनाइए जिनकी स्थिति तटवर्ती है।
(ii) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा अंडमान व निकोबार द्वीप समूह के क्षेत्रफल और जनसंख्या में अंतर की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
(iii) एक ग्राफ़ पेपर पर दंड आरेख द्वारा केंद्र शासित क्षेत्रों के क्षेत्रफल व जनसंख्या को आलेख्तिा कीजिए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।

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NCERT Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 14 (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 14 Movements of Ocean Water (Hindi Medium)

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[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED] (पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न)

प्र० 1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
(i) महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है?
(क) ज्वार
(ख) तरंग
(ग) धाराएँ।
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर- (क) ज्वार

(ii) वृहत ज्वार आने का क्या कारण है?
(क) सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(ख) सूर्य और चंद्रमा द्वारा एक दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) तटरेखा का दंतुरित होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर- (क) सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल।

(iii) पृथ्वी तथा चंद्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अपसौर
(ख) उपसौर
(ग) उपभू
(घ) अपभू
उत्तर- (ग) उपभू

(iv) पृथ्वी उपसौर की स्थिति कब होती है?
(क) अक्तूबर
(ख) जुलाई
(ग) सितंबर
(घ) जनवरी
उत्तर- (घ) जनवरी

प्र० 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) तरंगें क्या हैं?
उत्तर- तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं, जल नहीं, जो कि महासागरीय सतह के आर-पार गति करती हैं। तरंगों में जल-कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं। जैसे ही एक तरंग महासागरीय तट पर पहुँचती है, इसकी गति कम हो जाती है। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पाई जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं, बड़ी होती जाती हैं।

(ii) महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?
उत्तर- वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती है। तरंगें वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं। अधिकतर तरंगें वायु के जल के विपरीत दिशा में गतिमान होने से उत्पन्न होती हैं।

(iii) ज्वार-भाटा क्या है?
उत्तर- चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल के नियतकालिक उठने या गिरने को ज्वार-भाटा कहा जाता है। जब समुद्र का जल समुद्र तल से ऊपर उठता है तो उसे ज्चार कहा जाता है और जब समुद्र का जल नीचे की ओर होता है तो उसे भाटा कहा जाता है।

(iv) ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
उत्तर- चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वार-भाटाओं की उत्पत्ति होती है। दूसरा कारक अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है। गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्त्वपूर्ण ज्वार-भाटाओं को उत्पन्न करने के लिए उतरदायी हैं। चंद्रमा की तरफ वाले पृथ्वी के भाग पर एक ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, जब विपरीत भाग पर चंद्रमा का गुरुत्वीय आकर्षण बल उसकी दूरी के कारण कम होता है तब अपकेंद्रीय बल दूसरी तरफ ज्वार उत्पन्न करता है।

(v) ज्वार-भाटा नौसंचालन से कैसे संबंधित है?
उत्तर- ज्वार-भाटा नौसंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य-संबंधी योजनाओं में मदद करता है। नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्त्व है। ज्वार की ऊँचाई बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर नदियों के किनारे वाले बंदरगाहों पर एवं ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछली रोधिकाएँ होते हैं जो कि नौकाओं एवं जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने से रोकती हैं। जिस नदी के समुद्री तट के मुहाने पर | बंदरगाह हो और जब ज्वार आता है तो बड़े-बड़े जहाज बंदरगाह में प्रवेश कर जाते हैं। इसका उदाहरण भारत के हुगली नदी के तट पर स्थित कोलकाता बंदरगाह है।

प्र० 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।
(i) जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं? उत्तर-पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
उत्तर- जलधाराएँ अधिक तापमान वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बहती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती हैं। उदाहरणार्थ गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर यूरोप के पश्चिमी तट की ओर बहती है। यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी बर्फ नहीं जमने देती। जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाडा के उत्तरी-पूर्वी तट की शीत ऋतु से करते हैं। कनाडा का उत्तरी-पूर्वी तट लेब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यह शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है।

(ii) जलधाराएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?
उत्तर- महासागरीय जलधाराओं को उत्पन्न करने वाले कारक निम्न हैं
(क) प्रचलित पवनें – धाराओं को उत्पन्न करने में प्रचलित पवनों का बहुत बड़ा योगदान होता है। प्रचलित पवनें सदा एक ही दिशा में चलती हैं। ये सागर के ऊपरी तल पर से गुजरते समय जल को अपनी घर्षण शक्ति से सदा आगे धकेलती हैं। और धाराओं को जन्म देती हैं।

(ख) तापमान में भिन्नता – गर्म जल हल्का होकर फैलता है, इसलिए उसका तल ऊँचा हो जाता है। ठंडा जल भारी होता है, इसलिए नीचे बैठ जाता है। इस प्रकार तापमान में भिन्नता के कारण सागरीय जल के तल में अंतर आ जाता है और महासागरीय धाराओं का जन्म होता है।

(ग) लवणता में अंतर – अधिक लवणता वाला जल भारी होता है, इसलिए नीचे बैठ जाता है। उसका स्थान लेने के लिए कम लवणता तथा घनत्व वाला जल आता है और एक धारा बन जाती है।

(घ) वाष्पीकरण – जिन स्थानों पर वाष्पीकरण अधिक होता है, वहाँ पर जल का तल नीचे हो जाता है। और संतुलन बनाए रखने के लिए वहाँ अन्य क्षेत्रों से जल एकत्रित होना शुरू हो जाता है। इस प्रकार एक धारा उत्पन्न होती है।

(ङ) भूघूर्णन – पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है, जिससे कोरिऑलिस बल उत्पन्न हो जाता है। कोरिऑलिस बल के प्रभावाधीन बहता हुआ जल मुड़कर दीर्घ वृत्ताकार मार्ग का अनुसरण करता है, जिसे गायर्स कहते हैं। इन गायर्स में जल का परिसरण उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के अनुकूल तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल होता है। अतः फेरेल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में धाराएँ अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इससे नई धाराएँ बनती हैं।

(च) तटरेखा की आकृति – तटरेखा की आकृति का महासागरीय धाराओं की प्रवाहे-दिशा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उत्तरी हिंद महासागर में पैदा होने वाली धाराएँ भारतीय प्रायद्वीप की तट रेखा का अनुसरण करती हैं।

(छ) ऋतु परिवर्तन – उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री धाराओं की दिशा ऋतु परिवर्तन के साथ बदल जाती है। शीत ऋतु में मानसून ड्रिफ्ट की दिशा पूर्व से पश्चिम तथा ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। हिंद महासागर में भूमध्य रेखीय विपरीत धारा केवल शीत ऋतु में ही होती है और
भूमध्यरेखीय धारा केवल ग्रीष्म ऋतु में बहती हैं।

परियोजना कार्य-
(i) किसी झील या तालाब के पास जाएँ तथा तरंगों की गति का अवलोकन करें। एक पत्थर फेंकें एवं देखें कि तरंगें कैसे उत्पन्न होती हैं।
(ii) एक ग्लोब या मानचित्र लें, जिसमें महासागरीय धाराएँ दर्शाई गई हैं, यह भी बताएँ कि क्यों कुछ जलधाराएँ गर्म हैं व अन्य ठंडी। इसके साथ ही यह भी बताएँ कि निश्चित स्थानों पर यह क्यों विक्षेपित होती हैं। कारणों का विवेचन करें।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।

Hope given Fundamentals of Physical Geography Class 11 Solutions Chapter 14 are helpful to complete your homework.

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NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium)

NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium)

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[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED] (पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न)

प्र० 1. वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? इसकी क्या कमियाँ हैं?
उत्तर: जब एक वस्तु का विनिमय प्रत्यक्ष रूप में दूसरी वस्तु से होता है तो उसे वस्तु विनिमय कहा जाता है। अन्य शब्दों में, वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें वस्तु का लेन-देन वस्तु से किया जाता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली की निम्नलिखित कमियाँ हैं
1. आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव-वस्तु विनिमय के लिए आवश्यक है कि एक व्यक्ति की आवश्यकता की वस्तु दूसरे व्यक्ति के पास हो और जो वस्तु दूसरा व्यक्ति चाहता है, वह पहले के पास हो। दूसरे शब्दों में, पहले व्यक्ति की वस्तु की पूर्ति, दूसरे की माँग की वस्तु हो और दूसरे व्यक्ति की। पूर्ति की वस्तु, पहले व्यक्ति के माँग की वस्तु हो। जब तक आवश्यकताओं को इस प्रकार का दोहरा संयोग नहीं होता, वस्तु की लेन-देन नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए यदि किसी के पास जूता है, परन्तु वह उसके बदले में गेहूँ तैयार नहीं तो विनिमय संभव नहीं है।
2. सामान्य लेखा इकाई का अभाव-वस्तु विनिमय प्रणाली में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का मूल्य जानने के लिए और तुलना करने के लिए कोई सर्वमान्य मापक नहीं है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति गेहूँ का
लेन-देन करना चाहता है तो उसे गेहूं का मूल्य कपड़े के रूप में (1 किलो गेहूँ = 1 मीटर कपड़ा), दूध के रूप में (1 किलो गेहूँ = 2 लीटर दूध) आदि बाजार में उपलब्ध हर वस्तु के रूप में पता होना चाहिए।
यह अत्यन्त कठिन कार्य है।
3. स्थगित भुगतान के मानक का अभाव-वस्तु विनिमय व्यवस्था में वस्तुओं का भविष्य में भुगतान करने में कठिनाई होती है। इस प्रणाली में ऐसी कोई इकाई नहीं होती जिसे स्थगित/भविष्य भुगतान के मानक के रूप में प्रयोग कर सकें। वस्तुओं के रूप में भावी भुगतानों का वस्तुओं के रूप में भुगतान किया जाए तो इसमें कई कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे भविष्य में दी जानेवाली वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर विवाद, भविष्य में भुगतान की वस्तु पर असहमति, अनुबंध की अवधि के दौरान वस्तु के अपने मूल्यमान में उतार-चढ़ाव का जोखिम जिससे एक को लाभ तथा दूसरे को हानि होने की संभावना रहती है। उदाहरण के लिए कीमत X ने 10 वर्ष के लिए अपना रथ श्रीमान Y को दिया। 10 वर्ष बाद वह वही रथ नहीं लौटा सकता, क्योंकि वे पुराने हो गए। यदि वह नया रथ लौटाता है तो गुणवत्ता पहले वाले रथ
से अधिक भी हो सकती है और कम भी।
4. मूल्य संचय का अभाव-यहाँ मूल्य को संचय वस्तुओं के रूप में हो सकता है, परन्तु मूल्य को वस्तुओं के रूप में संचित करने में निम्नलिखित कठिनाइयाँ हैं|
(i) मूल्य को वस्तुओं के रूप में संचित करने में अधिक स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
(ii) वस्तुएँ नाशवान होती हैं।
(iii) वस्तुओं के मूल्य में अंतर आ जाता है।
(iv) वस्तुओं को रखे हुए भी मूल्यहास होता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति अपनी बेटी के विवाह के लिए मूल्य का संचय करना चाहता है तो वह क्या संचय करेगा? क्या वह बारातियों का भोजन
बनवाकर रख देगा? क्या वह फर्नीचर खरीदकर रख देगा?
5. अन्य कठिनाइयाँ-
(i) वस्तु विनिमय में ऐसी वस्तुओं के लेन-देन में बहुत कठिनाई आती है जिसका
विभाजन और उपविभाजन नहीं हो सकता। मान लो 1 बैल = 100 किलो गेहूँ परन्तु बैल का मालिक केवल 50 किलो गेहूं खरीदना चाहता है तो वह आधा बैल नहीं दे सकता।
(ii) वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना चाहता है तो वह अपने धन को दूसरे स्थान पर ले जाने में असमर्थ हो सकता है। जैसे कोई अपने खेत एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जा सकता।

प्र० 2. मुद्रा के प्रमुख कार्य क्या-क्या हैं? मुद्रा किस प्रकार वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों को दूर करता है?
उत्तर: मुद्रा के हैं कार्य चार – माध्यम, मापक, मानक, भण्डार”
मुद्रा के प्रमुख कार्यों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।
1. प्राथमिक कार्य ।
2. गौण कार्य
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 2
1. विनिमय का माध्यम-यह मुद्रा का सर्वप्रथम और सर्वमहत्वपूर्ण कार्य है। मुद्रा के इस कार्य ने क्रय और विक्रय की इस क्रिया को एक दूसरे से भिन्न कर दिया है। आज का समय सभी अर्थव्यवस्थाएँ मौद्रिक अर्थव्यवस्थाएँ हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली के सबसे बड़ी कमी दोहरे संयोग का अभाव है। इसे मुद्रा के इस कार्य से दूर कर दिया हैं अब यदि एक वस्त्रों का विक्रेता चावल खरीदना चाहता है तो उसे ऐसा चावल विक्रेता ढूंढने की आवश्यकता नहीं है जो बदले में वस्त्र चाहता है। वह वस्त्र बेचकर मुद्रा प्राप्त कर सकता है। और उस प्राप्त मुद्रा से चावल खरीद सकता है। अतः मुद्रा से दोहरे संयोग के अभाव की कमी स्वतः दूर हो जाती है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण मुद्रा को सामान्यकृत क्रय शक्ति कहा जाता है।
2. मूल्य की इकाई-मुद्रा का ‘लेखा की इकाई’ कार्य को मूल्यमान का मापक भी कहा जाता है। मुद्रा के इस कार्य को अर्थ है कि जिस प्रकार प्रत्येक चर को मापने की एक इकाई होती है वजन को किलो में, कद को सेमी. में, दूरी को किमी. में इसी प्रकार किसी वस्तु के मूल्य को मुद्रा में मापा जाता है। अतः मुद्रा मूल्य की मापक इकाई का कार्य करती है। यदि कोई पूछे कि इस पर्स का क्या मूल्य है। तो हम यह नहीं कहेंगे कि एक पर्स बराबर 5 किलो चावल या 10 पेन बल्कि हम मौद्रिक रूप में उसका मूल्य बतायेंगे। अतः मुद्रा लेखा की इकाई कार्य करती है। वस्तु विनिमय प्रणाली में सामान्य मूल्य मापक ‘या लेखा की इकाई का अभाव या जिसे मुद्रा के इस कार्य ने दूर कर दिया।
3. स्थगित भुगतान का मान–आस्थगित भुगतान वे भुगतान होते हैं जो भविष्य में किसी समय भुगतान किये जाते हैं। क्योंकि मुद्रा का अपना मूल्य अर्थात् उसकी क्रय शक्ति सामान्यतः अपरिवर्ती रहती है। एक आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यावहारिक लेन-देन में साख और उधार का बहुत महत्व रहता है। आस्थागित भुगतान या भविष्य भुगतान मुद्रा में ही संभव होते हैं क्योंकि एक तो मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है और इससे मुद्रा का विनिमय का माध्यम कार्य उसे सामान्यकृत क्रयशक्ति प्रदान करता है। मुद्रा का प्रयोग भविष्य भुगतानों से संबंधित खतरे को भी कम कर देती है। आज के समय में मुद्रा के कारण ही इतने दीघकालीन
समझौते हो पाते हैं।
4. मूल्य का संचय-जब कोई व्यक्ति अपनी भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय’ करना चाहता है तो वह केवल मुद्रा के रूप में ही कर सकता है। इसके कारण इस प्रकार हैं:
(i) मुद्रा की क्रय शक्ति अन्य वस्तुओं की तुलना में अपरिवर्तित रहती है।
(ii) मुद्रा को कीड़ा दीमक आदि नहीं लगता अर्थात् मुद्रा रखे हुए नष्ट नहीं होती।
(iii) मुद्रा का संचय करने में बहुत कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
(iv) मुद्रा को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को भेजा जा सकता है मान लो कोई व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के लिए अभी से कुछ बचत करना चाहते हैं तो क्या वे अभी से भोजन बनवा सकते हैं या वे अभी से वस्त्र खरीदकर रख सकते हैं? नहीं वे मुद्रा के रूप में अपने भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय कर सकते हैं।
5. मूल्य का हस्तांतरण-मुद्रा के कारक मूल्य का हस्तांतरण आसान हो गया है। यदि किसी व्यक्ति को भारत से कनाडा में मूल्य का हस्तांतरण करना है तो मुद्रा के माध्यम से यह बहुत सहज हो गया है। बैंक मुद्रा इसमें और अधिक सहायक है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण आज संपूर्ण विश्व एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरह लेन-देन कर पा रहा है।
मुद्रा के प्रत्येक कार्य विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा हैविनिमय प्रणाली की कमी मुद्रा का वह कार्य जो इस कमी को दूर कर रहा है।
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 2.1
इस प्रकार मुद्रा का प्रत्येक कार्य वस्तु विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा है।

प्र० 3. संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग क्या है? किसी निर्धारित समयावधि में संव्यवहार मूल्य से यह किसी प्रकार संबंधित है?
उत्तर: मुद्रा की माँग संव्यवहार को पूरा करने के उद्देश्य से की जाती है तो इसे संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग कहा जाता है। अन्य शब्दों में यह गृहस्थों तथा फर्मों द्वारा अपने दिन-प्रतिदिन के लेन-देन के कार्यों के लिए की गई मुद्रा की माँग है। सौदों के लिए नकदी संचय की माँग इसीलिए होती है, क्योंकि मुद्रा की प्राप्ति और उसके व्यय में समय का अन्तर होता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आये मासिक आधार पर प्राप्त करता है और मास के पहले दिन बिल का भुगतान करते हैं, तो हमें पूरे मास नकद राशि धारण करने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु ऐसा नहीं है लोग अलग-अलग समय पर आय प्राप्त करते हैं। उनका व्यय उस पूरे समयांतराल में लगातार होता रहता है। व्यक्ति एवं फर्मे कितनी मात्रा में नकदी का संचय करना चाहेंगे यह सौदों की कुल मात्रा पर निर्भर करता है। अर्थव्यवस्था में कुल सौदों की मात्रा राष्ट्रीय आय पर निर्भर करती है। सूत्र के रूप में
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 3
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 3.1
अतः किसी अर्थव्यवस्था में संव्यवहार के लिए मुद्रा की माँग का अर्थव्यवस्था की वास्तविक आय और उसके औसत कीमत स्तर के बीच धनात्मक संबंध होता है।

प्र० 4. मान लीजिए कि एक बंधपत्र दो वर्षों बाद 500 ₹ के वादे का वहन करता है, तत्काल कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं
होता है। यदि ब्याज दर 5% वार्षिक है, तो बंधपत्र की कीमत क्या होगी?
उत्तर:
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 4

प्र० 5. मुद्रा की सट्टा माँग और ब्याज की दर में विलोम संबंध क्यों होता है?
उत्तर: जब हम मुद्रा को सट्टा माँग के उद्देश्य से अपने पास रखते हैं तो मुद्रा को नकदी रूप में अपने पास रखने की अवसर लागत ब्याज दर है। यदि हम 5000 बैंक में रखें और यह हमें 10% प्रति वर्ष ब्याज देता है तो इस 5000 को अपने पास नकदी के रूप में रखने की अवसर लागत १ 500 है, परन्तु यदि ब्याज दर कम होकर 5% हो जाए तो अवसर लागत भी कम होकर ₹ 250 हो जायेगी।
अतः ब्याज की दर अधिक तो नकदी रखने की अवसर लागत अधिक और तदनुसार मुद्रा की सट्टा माँग कम होगी और विपरीत।। इसे अन्य शब्दों में भी समझा जा सकता है। एक व्यक्ति के पास दो विकल्प हैं एक वह अपने पास उपलब्ध नकद मुद्रा को बान्ड में निवेश कर दे और दूसरा वह उसे सट्टा उद्देश्य के लिए अपने पास रखे। यदि वह नकदी को सट्टा उद्देश्य के लिए अपने पास रखता है तो उसे वह आय छोड़नी होगी, जो वह इसे बॉण्ड में निवेश करके ब्याज के रूप में प्राप्त कर सकता है। इसे हम नकदी रखने की कीमत कह सकते हैं। माँग के नियम
के अनुसार, कीमत बढ़ने पर माँगी गई मात्रा कम होती है तथा विपरीत अतः ब्याज दर बढ़ने पर सट्टा उद्देश्य के लिए माँगी गई मुद्रा की मात्रा में कमी होगी तथा विपरीत। अतः मुद्रा की सट्टा माँग और ब्याज दर में विपरीत संबंध है।

प्र० 6. तरलता पाश क्या है?
उत्तर: तरलता पाश एक ऐसी स्थिति है जिसमें ब्याज की दर अति निम्न होती है और हर निवेशक भविष्य में ब्याज दर में वृद्धि की आशा रखता है। परिणामस्वरूप निवेशकों को बॉण्ड में निवेश करना आकर्षक नहीं लगता। ऐसी हालत में लोग बॉण्डस बेचकर मुद्रा अपने पास इकट्ठी करते जाते ? हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में बॉण्डस ऐसी परिसंपत्ति ना के बराबर आय 7प्रदान करती है। इससे मुद्रा के लिए सट्टेबाजी की माँग अनंत या पूर्ण लोचदार हो जाती है। इसे नीचे दिए गए चित्र में दिखाया गया है। ब्याज दर = 2% के बाद मुद्रा माँग वक्र X-अक्ष के समान्तर हो E4 गया है। इस स्थिति को तरलता पाश या तरलता फंदा कहा जाता
तरलता पाश है। यह स्थिति मौद्रिक अधिकारियों के लिए एक कठिन चुनौती है। क्योंकि इस स्थिति में मौद्रिक नीति द्वारा भी साख व मुद्रा की पूर्ति । को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
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प्र० 7. भारत में मुद्रा पूर्ति की वैकल्पिक परिभाषा क्या है?
उत्तर: भारत में मुद्रा की पूर्ति की भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा चार वैकल्पिक परिभाषाएँ दी गई हैं नामतः M1, M2, M3 और M4 जो इस प्रकार हैं।
M1 = C + DD + OD
M2 = M1 + डाकघर बचत बैंकों में बचत जमाएँ।
M3 = M1 + वाणिज्यिक बैंकों की निवल आवधिक जमाएँ
M4 = M3 + डाकघर बचत संस्थाओं में कुल जमाएँ (राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्रों को छोड़कर)
जहाँ, C = जनता के पास करेंसी
DD = माँग जमाएँ।
OD = रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएँ
इसे M1 को संकुचित मुद्रा तथा M3 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है?

प्र० 8. वैधानिक पत्र क्या है? कागजी मुद्रा क्या है?
उत्तर: वैधानिक पत्र अथवा वैधानिक मुद्रा – इससे तात्पर्य उस मुद्रा से है जिसे कानून का समर्थन प्राप्त है और कोई भी व्यक्ति इसे अस्वीकार नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, भारत की घरेलू सीमा के भीतर कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार के लेन-देन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 100 ₹ या उससे अधिक के नोटों को लेने से इंकार नहीं कर सकता।
कागजी मुद्रा – इससे तात्पर्य भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी करेंसी नोट और सिक्कों से हैं इसका सोने और चाँदी के सिक्कों की तरह कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता और यह सरकार के आदेश पर प्रचलित होती है। इस मुद्रा को आदेश मुद्रा भी कहा जाता है।

प्र० 9. उच्च शक्तिशाली मुद्रा क्या है?
उत्तर: उच्च शक्तिशाली मुद्रा से तात्पर्य देश के मौद्रिक प्राधिकरण द्वारा निगमित की गई मुद्रा से है, इसे मौद्रिक आधार
के नाम से भी जाना जाता है। उच्च शक्तिशाली मुद्रा में करेंसी तथा व्यावसायिक बैंक के पास माँग जमाएँ तथा भारतीय रिजर्व बैंक के पास रखी अन्य जमाएँ शामिल की जाती हैं। यह भारतीय रिजर्व बैंक की देश की मौद्रिक प्राधिकरण की संपूर्ण देयता को दिखाता है। यदि कोई आम जनता भारतीय रिजर्व बैंक को करेंसी नोट प्रस्तुत करता है, तो रिजर्व बैंक को उस मुद्रा के मूल्य पर अंकित मूल्य की राशि के बराबर का भुगतान करना होता है। इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक में जमा की गई राशि भी लौटाए जाने योग्य होती है, जब जमाधारी इसकी माँग करते हैं।

प्र० 10. व्यावसायिक बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: व्यावसायिक बैंक के कार्य-बैंकों के दो सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य हैं-जमा स्वीकार करना और ऋण देना।
1. जमा स्वीकार करना-बैंक लोगों की बचतों को जमा करता है। बैंकों के साथ हम तीन प्रकार के खाते खोल सकते हैं-
(i) बचत खाता
(ii) चालू खाता
(iii) सावधि खाता
(i) बचत खाता – यह खाता छोटी-छोटी बचतों को प्रोत्साहित करने के लिए होता है। यह परिवारों के लिए लाभदायक है, जिनको एक बार रुपया जमा करवाने के बाद तुरंत ज़रूरत नहीं पड़ती है। एक निश्चित सीमा तक ही रकम को इस खाते से हम निकलवा सकते हैं। इसमें ब्याज की दर सावधि जमा से कम होती है।
(ii) चालू खाता – यह ऐसी जमा होती है जिनका भुगतान बैंको को खाताधारियों की माँग पर तत्काल करना होता है इस खाते में जमा राशियाँ, माँग जमा कहलाती हैं, क्योंकि माँगने पर कभी भी निकलवा सकते हैं। यह खाता व्यापारी लोगों के लिए उपयोगी होता है, जिनको दिन में कई बार रुपया निकलवाने की जरूरत पड़ती है। चूंकि बैंक को इस खाते का पैसा सदा तैयार रखना पड़ता है, इसलिए इस खाते में बैंक ब्याज नहीं देता, बल्कि उनसे कुछ-न-कुछ लेता है। चेक द्वारा पैसा निकालने की सुविधा उपलब्ध रहती है।
(iii) सावधि खाता-सावधि जमा वह होती है जिसकी परिपक्वता की अवधि निर्धारित होती है। इसमें दीर्घ व निश्चित काल के लिए जमा स्वीकार की जाती है, इसलिए इस खाते में ब्याज की रकम अधिक होती है। यह निश्चित अवधि के लिए होता है और समय पूरा होने पर ही इसे निकलवा सकते हैं इससे पहले नहीं। इसमें चेक की सुविधा नहीं होती। यह बहुत ही धनी लोगों के लिए लाभकारी है, जिनको कभी रुपए की जरूरत नहीं होती। मियादी जमा की एक किस्म आवती जमा भी है जिसमें खाता धारक एक निश्चित अवधि तक हर महीन निश्चित राशि जमा करता है। जैसे-3 वर्षों तक 100 ₹ प्रति मास जमा करना। इसे मुद्रा की पूर्ति में शामिल नहीं किया जाता।।
2. ऋण देना-बैंक का दूसरा मुख्य कार्य ग्राहकों को ऋण देना है। बैंक दूसरे लोगों से जमा स्वीकार करता है, उसका एक निश्चित भाग सुरक्षा कोष में रखकर, शेष राशि व्यापारियों व उद्यमियों को उत्पादक कार्यों के लिए उधार दे देता है और उस पर ब्याज कमाता है। वास्तव में बैंक की आय का यही मुख्य स्त्रोत है। बैंक निम्नलिखित रूपों में ऋण तथा अग्रिम प्रदान करता है। बैंक ऋण निम्नलिखित रूपों में दिया जा सकता है. (i) नकद साख (ii) मांग उधार
(iii) अल्पावधि ऋण
(iv) ओवर ड्राफ्ट
(v) विनिमय बिलों पर कटौती
3. एजेंसी कार्य-बैंक अपने ग्राहकों का एजेंट के रूप में भी काम करता है जिसके लिए बैंक कुछ कमीशन लेता है। बैंक द्वारा प्रदत्त एजेंसी सेवाएँ निम्नलिखित हैं|
(i) नकद कोषों का हस्तांतरण-बैंक-ड्राफ्ट उधारे खाते की चिट्ठी तथा अन्य साख-पत्रों द्वारा बैंक एक स्थान से दूसरे स्थान को रकम का स्थानांतरण करता हैं ये सेवा कम लागत, शीघ्रता और सुरक्षायुक्त होती है।
(ii) बैंक अपने ग्राहकों के लिए कंपनियों के शेयर बेचता और खरीदता है। यह कंपनियों के नाम पर हिस्सेदारी में लाभ को बाँटता है।
(iii) नकद संग्रह करना-बैंक अपने ग्राहकों के लिए उनके आदेश पर चेक, धनादेश, हुंडियों आदि की रकम उनके दाताओं से वसूल करता है।
(iv) ग्राहकों को आयकर संबंधी परामर्श देता है और उनके आयकर का भुगतान करता है।
4. सामान्य उपयोगी सेवाएँ-बैंक द्वारा उपलब्ध अन्य उपयोगी सेवाएँ निम्नलिखित हैं
(i) बैंक, विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करता है।
(ii) कीमती वस्तुएँ जैसे-जेवरात, सोना, चाँदी, कागज पत्रों को सुरक्षित रखने के लिए लाकर्स उपलब्ध करता है।
(iii) पर्यटक चेक और उपहार चेक जारी करता है।

प्र० 11. मुद्रा गुणक क्या है? इसका मूल्य आप कैसे निर्धारित करेंगें? मुद्रा गुणक के मूल्य के निर्धारण में किस अनुपातों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है?
उत्तर:
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 11

प्र० 12. भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के उपकरण कौन-कौन से हैं? बाह्य आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक किस प्रकार मुद्रा की पूर्ति को स्थिर करता है?
उत्तर: केन्द्रीय बैंक/भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के उपकरणों को दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है
1. मात्रात्मक उपकरण
2. गुणात्मक उपकरण
मात्रात्मक उपकरण साख की कुल मात्रा को प्रभावित करते हैं अर्थात् ये साख की कुल मात्रा को बढ़ाते अथवा घटाते हैं जबकि गुणात्मक उपकरण साख की दिशा को प्रभावित करते हैं। यदि अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव है तो साख को संकुचित किया जाता है और यदि अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी/अपस्फीतिकारी दबाव है तो साख का विस्तार किया जाता हैं मात्रात्मक उपायों द्वारा साख, को अनुत्पादक उद्देश्यों से कम करके उत्पादक उद्देश्यों के लिए बढ़ाया जाता है।
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 12
इसे विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया गया है
1. मात्रात्मक उपकरण-मात्रात्मक उपकरण मौद्रिक नीति के वे उपकरण हैं जो साख की उपलब्ध कुल मात्रा को प्रभावित करते हैं। ये इस प्रकार हैं
(i) बैंक दर – बैंक दर से अभिप्राय उस ब्याज दर से है जिस पर केन्द्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को। अल्पकालीन ऋण देता है। इसे रेपो दर (Repo Rate) भी कहते हैं। यदि अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव है तो बैंक दर को बढ़ा दिया जाता है, क्योंकि बैंक दर बढ़ने पर वाणिज्यिक बैंक भी ऋणों की ब्याज दर बढ़ा देते हैं और बाजार में साख की माँग कम हो जाती है। दूसरी ओर आर्थिक मंदी के समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंक दर कम कर दी जाती है इससे ब्याज पर कम हो जाती है और साख की माँग बढ़ जाती है।
(ii) खुले बाजार की क्रियाएँ – जब भारतीय रिजर्व बैंक सरकारी प्रतिभूतियों को खुले बाजार में बेचता और खरीदता है तो इसे खुले बाजार की क्रियाएँ कहा जाता है। जब अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक प्रतिभूतियाँ बेचता है जिससे वाणिज्यिक बैंकों से वह उतनी नकद राशि खींच लेता है और उनकी ऋण देने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार केन्द्रीय बैंक साख की उपलबता को नियंत्रित करता है दूसरी ओर जब अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी होती है तो वह प्रतिभूतियाँ खरीदता है, जिससे वाणिज्यिक बैंक की ऋण देने की क्षमता बढ़ जाती है, क्योंकि उसके
पास उपलब्ध नकद राशि बढ़ जाती है।
(iii) नकद आरक्षित अनुमान (CRR) – प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को अपनी जमाओं का एक न्यूनतम प्रतिशत कानूनी तौर पर केन्द्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है। यह दर केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है। जब अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी दबाव होता है तो इस अनुपात को बढ़ा दिया जाता
NCERT Solutions for Class 12 Macroeconomics Chapter 3 Money and Banking (Hindi Medium) 12.1
अतः इसके बढ़ने से बैंक की साख निर्माण क्षमता कम हो जाती है। इसके विपरीत आर्थिक मंदी के समय CRR को कम कर दिया जाता है।
जिससे बैंक की साख निर्माण क्षमता बढ़ जाती है।
(iv) सांविधिक तरलता अनुपात (SCR)-सांविधिक तरलता अनुपात से तात्पर्य वाणिज्यिक बैंकों की तरल परिसंपत्तियों से है जो उन्हें अपनी कुल जमाओं के एक न्यूनतम प्रतिशत के रूप में दैनिक आधार पर अपने पास रखनी होती है, ताकि वे अपने जमाकर्ताओं की नकद माँग को पूरा कर सकें। CRR की भाँति SLR में भी स्फीतिकारी दबाव की स्थिति में वृद्धि की जाती है, ताकि बैंक की साख निर्माण क्षमता कम हो जाए।
2. गुणात्मक उपकरण-ये साख निर्माण के वे उपकरण हैं जो साख की मात्रा को प्रभावित नहीं करते बल्कि साख के प्रवाह को किसी विशेष क्षेत्र की ओर निर्दिष्ट करते हैं। ये मुख्यतः तीन प्रकार के हैं जिनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है
(i) सीमांत आवश्यकता – ऋणों की सीमान्त आवश्यकता से तात्पर्य बैंक द्वारा दिए गए ऋण तथा गिरवी रखी गई वस्तु के वर्तमान मूल्य से है। सामान्यतः कोई व्यक्ति जितने मूल्य की वस्तु जमानत के तौर पर बैंक के पास रखता है, बैंक उससे कम का ऋण देता है। इस अन्तर को रखने का उद्देश्य यह होता है कि वस्तु के मूल्य में कमी होने पर बैंक को नुकसान न हो आदि। करोड़ की प्रतिभूतियों पर बैंक 80 लाख ऋण देता है तो सीमांत आवश्यकता 20% है और यदि वह 60 लाख का ऋण देता है तो सीमांत आवश्यकता 40% है। सीमान्त आवश्यकता बढ़ने पर उधारकर्ता की ऋण लेने की क्षमता कम हो जाती है तथा इसके विपरीत रिजर्व बैंक जिस क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता बढ़ाना चाहता है उस क्षेत्र के ऋणों के लिए सीमान्त आवश्यकता कम कर देगा जैसे 1 करोड़ की प्रतिभूतियों पर शिक्षा ऋण 90 लाख तक का भी दिया जा सकता है। इस प्रकार यह साख के प्रवाह को एक विशेष दिशा प्रदान करता है।
(ii) साख की राशनिंग-साख की राशनिंग से तात्पर्य विभिन्न वाणिज्यिक क्रियाओं के लिए साख की मात्रा का कोटा निर्धारण करना है। ऋण देते समय वाणिज्यिक बैंक किसी विशेष क्षेत्र को कोटे की
सीमा से अधिक ऋण नहीं दे सकते।
(iii) नैतिक प्रभाव-कभी-कभी केन्द्रीय बैंक सदस्य बैंकों पर नैतिक प्रभाव डालकर उन्हें साख नियंत्रण के लिए अपनी नई नीति के अनुसार काम करने के लिए सहमत कर लेते हैं। केन्द्रीय बैंक का लगभग सभी वाणिज्यिक बैंकों पर नैतिक प्रभाव है। बाहरी आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा पूर्ति का स्थिरीकरण-बाह्य आघातों के विरुद्ध भारतीय रिजर्व बैंक स्थिरीकरण के द्वारा मुद्रा की पूर्ति को स्थिर करता है। स्थिरीकरण का अर्थ है भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी विनिमय अंत:प्रवाह में वृद्धि के विरुद्ध मुद्रा की पूर्ति को स्थायी रखने के लिए किये गए हस्तक्षेप से है। स्थिरीकरण के अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी विनिमय की मात्रा के बराबर की मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री खुले बाजार में करता है। जिससे अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा अप्रभावित रहती है।

प्र० 13. क्या आप ऐसा मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक बैंक ही ‘मुद्रा का निर्माण करते हैं?
उत्तर: हाँ, वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। वे अपने द्वारा दिए गए ऋणों से संबंधित माँग जमाओं के रूप में साख का सृजन करते हैं। वाणिज्यिक बैंकों की माँग जमाएँ उनके नकद कोषों से कई गुणा अधिक होती है। यदि यह मान लें कि उनके नकद कोषों की राशि के 1000 है तथा माँग जमाएँ ₹ 10,000 है, तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोषों से दस गुणा अधिक हो जाएगी। इसी प्रकार नकद कोषों के ₹ 1,000 के आधार पर वाणिज्यिक बैंकों ने मुद्रा की पूर्ति में ₹ 10,000 का योगदान दिया।

प्र० 14. भारतीय रिज़र्व बैंक की किस भूमिका को अंतिम ऋणदाता कहा जाता है?
उत्तर: अंतिम ऋणदाता के रूप में केंद्रीय बैंक वित्तीय संकट के दौरान वाणिज्यिक बैंकों के लिए गारंटीकर्ता के रूप में तैयार होता है। वाणिज्यिक बैंक अपनी जमाओं को सामूहिक रूप से तुरंत निकलवाने के लिए तत्पर रहने वाले जमाकर्ताओं का विश्वास खो सकते हैं, चूंकि वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोष उनकी माँग जमाओं का एक छोटा-सा भाग होते हैं, कोष बाहर जा सकते हैं, जिसके कारण बैंक में वित्तीय संकट आ जाता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ही होता * है जो वाणिज्यिक बैंक के लिए गारंटीकर्ता की भांति तैयार रहता है तथा उसे दिवालियापन से बचाता है।

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NCERT Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 3 Environment and Society (Hindi Medium)

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न [NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्र०1. पारिस्थितिकी से आपका क्या अभिप्राय है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • पारिस्थितिकी प्रत्येक समाज का आधार होती है। ‘पारिस्थितिकी’ शब्द से अभिप्राय एक ऐसे जाल से है जहाँ भौतिक और जैविक व्यवस्थाएँ तथा प्रक्रियाएँ घटित होती हैं और मनुष्य भी इसका एक अंग होता है।
  • पर्वत तथा नदियाँ, मैदान तथा सागर और जीव-जंतु ये सब पारिस्थितिकी के अंग हैं।
  • किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमंडल की अंत:क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए मरुस्थलीय प्रदेशों में रहने वाले जीव-जंतु अपने आपको वहाँ की पारिस्थितियों के अनुरूप; जैसे कम वर्षा, पथरीली अथवा रेतीली मिट्टी तथा अत्यधिक तापमान में अपने आप ढाल लेते हैं।
  • पारिस्थितिकीय कारक इस बात का निर्धारण करते हैं कि किसी स्थान विशेष पर लोग कैसे रहेंगे।

प्र० 2. पारिस्थितिकी सिर्फ प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित क्यों नहीं है?
उत्तर-

  • मनुष्य की क्रियाओं द्वारा पारिस्थितिकी में परिवर्तन आया है। पर्यावरण के प्राकृतिक कारक; जैसे-अकाल या बाढ़ की स्थिति आदि की उत्पत्ति भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण होती है।
  • नदियों के ऊपरी क्षेत्र में जंगलों की अंधाधुध कटाई नदियों में बाढ़ की स्थिति को और बढ़ा देती है।
  • पर्यावरण में मनुष्य के हस्तक्षेप का एक अन्य उदाहरण विश्वव्यापी तापमान वृद्धि के कारण जलवायु में आनेवाला परिवर्तन भी है। समय के साथ पारिस्थितिकीय परिवर्तन के लिए कई बार प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों में अंतर करना काफ़ी कठिन होता है।
  • हमारे चारों ओर कुछ ऐसे तत्व भी हैं जो पूरी तरह से मनुष्य द्वारा निर्मित है।
  • कृषि भूमि जहाँ मिट्टी तथा पानी के बचाव के कार्य चल रहे हों, खेत और पालतू पशु, कृत्रिम खाद तथा कीटनाशक का प्रयोग, यह सब स्पष्ट रूप से मनुष्य द्वारा प्रकृति में किया गया परिवर्तन है।
  • शहर के निर्माण में प्रयुक्त सीमेंट, ईंट, कंक्रीट, पत्थर, शीशा और तार हालाँकि प्राकृतिक संसाधन हैं, परंतु फिर भी ये मनुष्य की कलाकृति के उदाहरण हैं।

प्र० 3. उस दोहरी प्रक्रिया का वर्णन करें जिसके कारण सामाजिक पर्यावरण का उद्भव होता है?
उत्तर-

  • जैवभौतिक पारिस्थितिकी तथा मनुष्य के हस्तक्षेप की अन्त:क्रिया के द्वारा सामाजिक पर्यावरण का उद्भव होता है।
  • जिस प्रकार से प्रकृति समाज को आकार देती है। ठीक उसी प्रकार से समाज भी प्रकृति को आकार देता है। अतः यह दो-तरफा प्रक्रिया है। उदाहरण के तौर पर, सिंधु-गंगा की उपजाऊ भूमि गहन कृषि के लिए उपयुक्त है। इसकी उच्च उत्पादक क्षमता के कारण यहाँ घनी आबादी का क्षेत्र बसा है और अतिरिक्त उत्पादन से गैर कृषि क्रियाकलाप आगे चलकर जटिल अधिक्रमिक समाज तथा राज्य को जन्म देते हैं।
  • ठीक इसके विपरीत, राजस्थान के मरुस्थल केवल पशुपालकों को ही सहारा दे पाते हैं। वे अपने पशुओं के चारे की खोज में इधर-उधर भटकते रहते हैं ताकि उनके पशुओं को चारा मिलता रहे।
  • ये पारिस्थितिकी के उदाहरण हैं जो मानव के जीवन और संस्कृति को आकार देते हैं।
  • दूसरी तरफ, पूँजीवादी सामाजिक संगठनों ने भी विश्वभर की प्रकृति को आकार दिया है।
  • निजी परिवहन पूँजीवादी उपयोगी वस्तु का एक ऐसा उदाहरण है जिसने जीवन तथा भू-दृश्य दोनों को बदल दिया है। शहरों में वायु प्रदूषण तथा भीड़भाड़, क्षेत्रीय अगड़े, तेल के लिए युद्ध और विश्वव्यापी तापमान में वृद्धि, गाड़ियों के पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों के कुछ एक उदाहरण हैं।

प्र० 4. सामाजिक संस्थाएँ कैसे तथा किस प्रकार से पर्यावरण तथा समाज के आपसी रिश्तों को आकार देती हैं?
उत्तर-

  • पर्यावरण तथा समाज के बीच अंत:क्रिया को सामाजिक संगठन द्वारा आकार दिया जाता है।
  • यदि वनों पर सरकार का आधिपत्य है तो यह निर्णय लेने का अधिकार भी सरकार का ही होगा कि क्या वनों को पट्टे पर किसी लकड़ी के कारोबार करने वाली कंपनी को देनी चाहिए अथवा ग्रामीणों को जंगलों से प्राप्त होने वाले वन्य उत्पादों को संग्रहित करने का अधिकार हो।
  • भूमि तथा जल संसाधन का व्यक्तिगत स्वामित्व इस बात का निर्णय करेंगे कि अन्य लोगों को किन नियमों तथा शर्तों के अधीन इन संसाधनों के उपयोग का अधिकार प्राप्त हो।
  • उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्गत संसाधनों पर नियंत्रण श्रम विभाजन से संबंधित है।
  • पुरुषों की तुलना में कृषिहीन मजदूरों एवं स्त्रियों का प्राकृतिक संसाधनों से संबंध भिन्न होता है।
  • सामाजिक संगठन इस तथ्य को प्रभावित करता है। कि विभिन्न सामाजिक समूह किस प्रकार अपने आपको पर्यावरण से जोड़ते हैं।
  • प्रासंगिक ज्ञान की व्यवस्था के अतिरिक्त पर्यावरण तथा समाज के संबंध उसके सामाजिक मूल्यों तथा प्रतिमानों में भी प्रतिबिंबित होते हैं।
  • पूँजीवादी मूल्यों ने प्रकृति के उपयोगी वस्तु होने की विचारधारा को पोषित किया है। इस संदर्भ में प्रकृति को एक वस्तु के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है और इसे लाभ के लिए खरीदा अथवा बेचा जा रहा है। उदाहरण के लिए, किसी नदी के बहुविकल्पीय सांस्कृतिक अर्थों; जैसे-पारिस्थितिकीय, उपयोगितावादी, धार्मिक तथा सौंदर्यपरकता के महत्व को समाप्त कर किस उद्यमकर्ता के लिए पानी को हानि या लाभ की दृष्टि से बेचने का करोबार बना दिया गया है।
  • कई देशों ने समानता तथा न्याय के समाजवादी-मूल्यों को स्थापित करने हेतु बड़े-बड़े जमींदारों से उजड़ी ज़मीनों को छीनकर उन्हें पुनः भूमिहीन किसानों में बाँट दिया है।
  • धार्मिक मूल्यों ने कई सामाजिक समूहों का नेतृत्व किया है ताकि धार्मिक हितों और विभिन्न किस्मों को संरक्षण हो सके। और अन्य यह मान सकें कि उन्हें अपने हितों के लिए पर्यावरण में परिवर्तन करने का दैवीय
    अधिकार प्राप्त है।

प्र० 5. पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए एक महत्वपूर्ण तथा जटिल कार्य क्यों हैं?
उत्तर-

  • हालाँकि पर्यावरण प्रबंधन एक कठिन कार्य है।
  • इसकी प्रक्रियाओं को पूर्वानुमान तथा उसे रोकना भी कंठिन है।
  • पर्यावरण के साथ मनुष्य के संबंध और अधिक जटिल हो गए हैं।
  • बढ़ते औद्योगीकरण के कारण संसाधनों का दोहन अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। यह पारिस्थितीकी तंत्र को विभिन्न प्रकार से प्रभावित किया है।
  • जटिल औद्योगिक तकनीक तथा संगठन की व्यवस्थाएँ बेहतरीन प्रबंधन के लिए अनिवार्य हैं। ये अधिकांशतः गलतियों के प्रति कमजोर तथा सुभेद्य होते हैं।
  • हम जोखिम भरे समाज में रहते हैं। हम ऐसी तकनीकों तथा वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, जिनके संबंध में हमें पूरी जानकारी नहीं है। औद्योगिक पर्यावरण में घटित नाभिकीय विपदा; जैसे-चेरनोबिल, भोपाल की औद्योगिक दुर्घटना, यूरोप में फैली ‘मैड काऊ’ बीमारी इसके खतरों को दर्शाते हैं।

प्र० 6. प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर-

  • ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण एक मुख्य समस्या मानी जा रही है। इससे श्वास और सेहत संबंधी अन्य बीमारियाँ तथा मृत्यु भी हो सकती है।
  • उद्योगों तथा वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसे तथा घरेलू उपयोग के लिए लकड़ी तथा उद्योगों से होने वाले प्रदूषण वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं।
  • खाना बनाने वाले ईंधन से आंतरिक प्रदूषण भी एक जोखिम भरा स्रोत है। यह विशेषकर ग्रामीण घरों के लिए सच है। यहाँ खाना बनाने के लिए हरी-भरी लकड़ियों का प्रयोग, अनुपयुक्त चूल्हे तथा हवा के निष्कासन की अव्यवस्था ग्रामीण महिलाओं के सेहत पर बुरा असर डालते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार तकरीबन 600,000 लोग भारत में 1998 के दौरान घरेलू प्रदूषण से मरे। यह भी सत्य है कि अकेले ग्रामीण क्षेत्रों में मरने वाले लोगों की संख्या 500,000 के करीब थी।
  • नदी और जलाशय से संबंधित प्रदूषण भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। शहर ध्वनि प्रदूषण से भी ग्रसित है। कई शहरों में यह विवाद न्यायालय के अधीन है। धार्मिक तथा सामाजिक अवसरों पर उपयोग किए जाने वाले लाउडस्पीकर, राजनीतिक प्रचार, वाहनों के होने और यातायात एवं निर्माण कार्य इसके प्रमुख स्रोत हैं।

प्र० 7. संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के प्रमुख मुद्दे कौन-कौन से हैं?
उत्तरे-

  • संसाधनों की क्षीणता का अर्थ है-अस्वीकृत प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करना, और यह पर्यावरण की एक गंभीर समस्या है।
  • सम्पूर्ण भारत में विशेषकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भूजल के स्तर में लगातार कमी होना एक गंभीर समस्या है।
  • नदियों पर बाँध बना दिए गए हैं और इसके बहाव को मोड़ दिया गया है। इस कारण पर्यावरण के जल बेसिन को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई करना असंभव है।
  • शहरों में पाये जाने वाले जलाशय भर दिए गए हैं। और उस पर निर्माण कार्य सम्पन्न होने के कारण प्राकृतिक जल निकासी के साधनों को नष्ट किया जा रहा है।
  • भूजल के समान मृदा की ऊपरी परत का निर्माण हजारों सालों के बाद होता है। पर्यावरण के कुप्रबंधन; जैसे-भू कटाव, पानी का जमाव तथा खारेपन इत्यादि के कारण कृषि संसाधन भी नष्ट होते जा रहे हैं।
  • मृदा की ऊपरी सतह के विनाश के लिए भवन-निर्माण के लिए ईटों का उत्पादन भी जिम्मेदारी है।
  • जंगल, घास के मैदान और आर्द्रभूमि जो कि जैविक विविध आवासों के उदाहरण हैं, ऐसे अन्य मुख्य संसाधन हैं, जो बढ़ती कृषि के कारण समाप्ति के कगार पर खड़े हैं।

प्र० 8. पर्यावरण की समस्याएँ समाजिक समस्याएँ भी हैं। कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-

  • पर्यावरण की समस्याएँ विभिन्न समूहों को प्रभावित करती हैं।
  • सामाजिक परिस्थिति और शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति अपने आपको पर्यावरण की आपदाओं से बचाने या उस पर विजय प्राप्त करने के लिए किस हद तक जा सकता है।
  • गुजरात राज्य के कच्छ (Kutch) में जहाँ पानी की अत्यधिक कमी है, वहाँ संपन्न किसानों ने अपने खेतों में नकदी फसलों की सिंचाई के लिए नलकूपों की गहरी खुदाई पर काफी धन खर्च किया है। जब वर्षा नहीं होती है तब गरीब ग्रामीणों के कुएँ सूख जाते हैं तथा उन्हें पीने तक के लिए पानी नहीं मिलता है।
  • ऐसे समय में संपन्न किसानों के लहलहाते खेत मानो उनका मजाक उड़ा रहे होते हैं। कुछ पर्यावरण संबंधी चिंतन कभी-कभी विश्वव्यापी चिंतन बन जाते हैं। परंतु यह सत्य है कि इसका संबंध किसी विशेष सामाजिक समूह से नहीं रहता है।
  • समाजशास्त्रीय अध्ययन से यह जाहिर होता है। कि किस प्रकार सार्वजनिक प्राथमिकताएँ तय की जाती हैं और किस प्रकार इन्हें आगे बढ़ाया जाता है। सार्वभौमिक रूप से उनका लाभदायक होना कठिन है। साथ ही, जनहित के कार्यों की रक्षक नीतियाँ राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्गों के लाभ की रक्षा करती हैं, या गरीब एवं राजनीतिक रूप से कमजोर वर्गों को नुकसान पहुँचाती हैं।

प्र० 9. सामाजिक पारिस्थितिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-

  • सामाजिक पारिस्थितिकी यह जाहिर करती है। कि सामाजिक संबंध विशेष रूप से संपत्ति तथा उत्पादन के संगठन पर्यावरण से संबंधित सोच और प्रयास को आकार देते हैं।
  • विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग पर्यावरण संबंधित मामलों को भिन्न प्रकार से परखते और समझते हैं।
  • वन्य विभाग उद्योग के लिए अधिक मात्रा में बाँस का निर्माण करेगा। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना होगा। साथ ही वन्य विभाग बाँस का निर्माण बाँस के टोकरे बनाने वाले कारीगर के लिए बाँस के उपयोग से अलग रूप में देखेगा। उनकी रुचियाँ और विचारध राएँ पर्यावरण संबंधी मतभेदों को जन्म देती हैं। इस प्रकार पर्यावरण संकट की जड़े सामाजिक असमानताओं में देखी जा सकती हैं।
  • पर्यावरण और समाज के आपसी संबंधों में परिवर्तन पर्यावरण संबंधित समस्याओं को सुलझाने का एक उपाय है। इसका अर्थ है विभिन्न समूहों के बीच संबंधों में परिवर्तन अर्थात पुरुष और स्त्री, ग्रामीण और शहरी लोग, जमीदार तथा मजदूर के संबंधों में परिवर्तन।
  • सामाजिक संबंधों में परिवर्तन से पर्यावरण प्रबंधन के लिए विभिन्न ज्ञान व्यवस्थाओं और ज्ञानतंत्र का जन्म होगा।

प्र० 10. पर्यावरण संबंधित कुछ विवादास्पद मुद्दे जिनके बारे में आपने पढ़ा या सुना हो उनका वर्णन कीजिए। (अध्याय के अतिरिक्त)
उत्तर- स्वयं करें।

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